हजारों करोड़ के विकास के दावों के बीच जर्जर दिशा निर्देशक बोर्ड ने खोली विकास की पोल
- स्मार्ट सिटी के दावों पर जमीनी सच्चाई भारी
- पड़ाव से मालवीय ब्रिज मार्ग पर जर्जर स्वागत द्वार खड़े कर रहा सवाल
- चंदौली-वाराणसी सीमा से ही बिगड़ जाती है शहर की छवि
- भ्रष्ट सिस्टम की नाकामी और कमीशन खोरी का नतीजा
वाराणसी(रणभेरी संवाददाता)। वाराणसी जिसे दुनिया आज एक नए रूप में देख रही है वह देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। बीते कुछ वर्षों में इस शहर को आधुनिक बनाने के नाम पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए गए। सड़कों का चौड़ीकरण हुआ घाटों का सौंदर्यीकरण का ढिंढोरा पीटा गया और शहर को स्मार्ट सिटी के रूप में स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएं चलाई गईं।
सरकार और प्रशासन ने हर मंच पर यह दावा किया कि वाराणसी अब सिर्फ एक धार्मिक नगरी नहीं बल्कि एक आधुनिक और स्मार्ट शहर बन चुका है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी वाराणसी को स्मार्ट सिटी वाराणसी के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन जब इन दावों की सच्चाई जमीन पर देखी जाती है तो तस्वीर कुछ और ही सामने आती है।

चंदौली और वाराणसी की सीमा पर स्थित पड़ाव से राजघाट की ओर जाने वाले मार्ग पर मालवीय ब्रिज चढ़ते वक्त लगा स्वागत द्वार रूपी दिशा निर्देशक बोर्ड इस पूरी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। यह वही स्थान है जहां से बिहार और पश्चिम बंगाल से आने वाले हजारों लोग सड़क मार्ग के जरिए चंदौली पार करते हुए वाराणसी में प्रवेश करते हैं और वाराणसी में उनका पहला सामना इसी प्रवेश द्वार से होता है। लेकिन यह स्वागत द्वार आज अपनी हालत पर रो रहा है।
यह पूरी तरह क्षतिग्रस्त है। इसका ढांचा जर्जर हो चुका है। साइनेज बोर्ड उखड़ चुका है और कई हिस्से ऐसे हैं जो चीथड़ों की तरह लटक रहे हैं। यह दृश्य न केवल शहर की छवि को धूमिल करता है बल्कि यह भी बताता है कि विकास के नाम पर किए गए कार्यों की निगरानी और रखरखाव किस स्तर पर हो रहा है।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं तो फिर शहर के सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश बिंदु की यह हालत क्यों है। यह कोई अंदरूनी गली या कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है बल्कि यह वह जगह है जहां से शहर का पहला परिचय होता है। ऐसे में इस स्थान की बदहाल स्थिति सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है।
स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ नए प्रोजेक्ट शुरू करना नहीं होता बल्कि उन प्रोजेक्ट्स का नियमित रखरखाव भी उतना ही जरूरी होता है। लेकिन वाराणसी के इस उदाहरण को देखकर लगता है कि यहां योजनाओं की शुरुआत तो जोर शोर से होती है लेकिन उनकी देखरेख समय के साथ गायब हो जाती है। यह स्वागत द्वार अब एक प्रतीक बन चुका है। यह प्रतीक है उन दावों का जो कागजों और भाषणों में तो बड़े नजर आते हैं लेकिन जमीनी हकीकत में टिक नहीं पाते।

यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या इसके निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान रखा गया था या फिर यह भी उन परियोजनाओं में शामिल है जहां काम तो पूरा दिखा दिया गया लेकिन वास्तविकता में मानकों का पालन नहीं हुआ। यदि इस द्वार की स्थिति को ध्यान से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग भी सवालों के घेरे में आता है। यह केवल समय के प्रभाव का परिणाम नहीं लगता बल्कि इसमें निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी दोनों पर सवाल उठते हैं। इस दिशा निर्देशक बोर्ड निर्माण के नाम पर खर्च किए गए धन का सही उपयोग हुआ या नहीं यह सवाल अब और गहरा होता जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मार्ग से रोजाना हजारों वाहन गुजरते हैं और हर आने जाने वाला व्यक्ति इस जर्जर द्वार और बोर्ड को देखता है। आज पड़ाव चौराहे पर सीना ताने खड़ा यह जर्जर द्वार शहर की छवि पर न केवल नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है बल्कि ज़ीरो टॉलरेंस के सरकारी दावे पर जोरदार तमाचा है।
यह केवल एक ढांचा नहीं बल्कि यह उस सोच का आईना है जिसमें दिखावे को प्राथमिकता दी जाती है और स्थायी व्यवस्था को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वाराणसी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए किए गए कथित प्रयासों के बीच इस तरह की तस्वीरें उन दावों पर जोरदार थप्पड़ है जो सरकार द्वारा हर दिन हर एक मंच से किए जाते हैं।

- यदि शहर के प्रवेश द्वार की यह स्थिति है तो यह समझना कठिन नहीं है कि अन्य स्थानों पर रखरखाव की स्थिति कैसी होगी।
- यह जरूरी है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले और केवल नए प्रोजेक्ट्स की घोषणा करने के बजाय पुराने और महत्वपूर्ण ढांचों के रखरखाव पर भी ध्यान दे।
- क्योंकि विकास केवल निर्माण से नहीं बल्कि उसके निरंतर संरक्षण से साबित होता है।
- यह स्वागत द्वार रूपी दिशा सूचक बोर्ड आज सिर्फ एक क्षतिग्रस्त ढांचा नहीं बल्कि एक ज्वलंत सवाल है।
- एक ऐसा सवाल जिसका जवाब प्रशासन को देना ही होगा।
- क्या स्मार्ट सिटी का सपना केवल प्रचार तक सीमित रहेगा या फिर जमीन पर भी इसकी सच्चाई दिखाई देगी।
- रणभेरी इस मुद्दे पर जिम्मेदार विभागों से जवाब की अपेक्षा रखता है कि आखिर कब तक वाराणसी की छवि इस तरह के जर्जर ढांचों के सहारे दांव पर लगती रहेगी।
