नवरात्र के बाद घाटों पर कचरे का अंबार, जलधारा बनी डंपिंग जोन
अब भी नहीं चेते तो इतिहास बन जाएगी काशी की पौराणिक नदी वरुणा
वाराणसी (रणभेरी)। काशी की उत्तरी सीमा तय करने वाली पावन वरुणा नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है। कभी धार्मिक आस्था, पुराणों और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रही यह नदी अब मलबे, प्लास्टिक और जहरीले कचरे के बोझ तले कराह रही है। नवरात्र के समापन के बाद जो तस्वीर घाटों से सामने आई है, वह श्रद्धा से ज्यादा संवेदनहीनता की भयावह दास्तान कहती है।

शास्त्री घाट से लेकर अन्य तटों तक हर ओर कूड़े का अंबार नजर आता है। हजारों श्रद्धालु पूजा सामग्री जैसे सिंदूर, प्लास्टिक की चुनरियां, बिंदी, नारियल के खोल और हवन अवशेष को सीधे नदी में प्रवाहित कर देते हैं। यह विडंबना ही है कि जिसे श्रद्धा से अर्पित किया जाता है, वही नदी के लिए जहर बनता जा रहा है। पानी में घुलते रासायनिक रंग और सिंथेटिक पदार्थ ऑक्सीजन स्तर को कम कर रहे हैं, जिससे जलीय जीवों का जीवन संकट में है।
समस्या केवल सतही कचरे तक सीमित नहीं है। वर्षों से फेंके जा रहे मूर्तियों के अवशेष, मिट्टी के बर्तन और निर्माण मलबे ने नदी के तल को ऊंचा कर दिया है। परिणामस्वरूप नदी की गहराई और चौड़ाई लगातार घट रही है। यही कारण है कि मानसून में जलस्तर बढ़ते ही वरुणा उफान पर आ जाती है और आसपास के रिहायशी इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। जिसे अक्सर प्राकृतिक आपदा कहा जाता है, वह दरअसल मानवीय लापरवाही का नतीजा है।
इस स्थिति के लिए आम जनता के साथ-साथ प्रशासन भी कम जिम्मेदार नहीं है। शहर के कई बड़े और छोटे नाले बिना शोधन के सीधे वरुणा में गिर रहे हैं। वर्षों से नालों को टैप करने और सीवर ट्रीटमेंट की योजनाएं कागजों तक सीमित हैं। सफाई अभियान केवल दिखावे तक सिमट जाते हैं, जबकि असली समस्या जस की तस बनी हुई है। नदी का पानी आज भी बदबूदार और गंदे नाले जैसा प्रतीत होता है।

धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह नदी कभी ऋषियों की तपस्थली मानी जाती थी। मान्यता है कि प्राचीन काल में यहां आध्यात्मिक गतिविधियां फलती-फूलती थीं। लेकिन आज वही वरुणा मानव लालच और अज्ञानता की शिकार बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सच्ची आस्था प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाती। यदि पूजा सामग्री का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया जाए तो नदी को बचाया जा सकता है।
पॉलीथीन में भरकर फेंकी जा रही सामग्री न केवल जल को प्रदूषित कर रही है, बल्कि हमारी परंपराओं के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन है, जहां जल को देवतुल्य माना गया है। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विडंबना भी है। आज वरुणा की हालत एक चेतावनी है। यदि समय रहते समाज और प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह ऐतिहासिक नदी केवल किताबों और कथाओं तक सिमट कर रह जाएगी। जरूरत है कि आस्था और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस नदी को जीवंत रूप में देख सकें।
