शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका !

शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका !
  • हर साल बदलते कोर्स और यूनिफॉर्म से बढ़ रहा अभिभावकों का आर्थिक बोझ
  • स्कूल बनाते है तय दुकानों से किताब खरीदने का दबाव, कमीशनखोरी का भी आरोप
  • आरटीई के 25 फीसद आरक्षण नियम पर भी सवाल, निजी स्कूलों की मनमानी जारी
  • बोले अभिभावक – शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सेवा का माध्यम बनाना जरूरी

वाराणसी (रणभेरी): नए शैक्षणिक सत्र की आहट के साथ ही शहर में एक बार फिर अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। बच्चों की पढ़ाई अब केवल शिक्षा का विषय नहीं रह गई, बल्कि यह मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों के लिए आर्थिक परीक्षा बनती जा रही है। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, किताब-कॉपी, यूनिफॉर्म और अन्य शुल्कों ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूल शिक्षा के नाम पर मनमानी कर रहे हैं। हर साल मामूली बदलाव के नाम पर नया सिलेबस लागू कर दिया जाता है, जिससे पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं।

मजबूरी में अभिभावकों को हर सत्र में नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। इतना ही नहीं, कई स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताब-कॉपी खरीदने का दबाव बनाया जाता है, जहां ऊंचे दाम पर सामग्री बेची जाती है। इस पूरे खेल में बुकसेलरों और स्कूलों के बीच मोटे कमीशन की बात भी सामने आती रही है, जो कई मामलों में 50 से 60 प्रतिशत तक बताया जाता है।

शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका !

सिर्फ किताबों तक ही यह मामला सीमित नहीं है। यूनिफॉर्म और जूतों के नाम पर भी अभिभावकों को हर साल नई खरीदारी के लिए मजबूर किया जाता है। कई स्कूल हर सत्र में ड्रेस का रंग या डिजाइन बदल देते हैं, जिससे पुराने कपड़े अनुपयोगी हो जाते हैं। इसके अलावा री-एडमिशन फीस, डेवलपमेंट फीस, कंप्यूटर फीस, स्मार्ट क्लास फीस जैसे विभिन्न शुल्कों की लंबी सूची अभिभावकों को आर्थिक रूप से झकझोर देती है।

शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ रहा है। एक ओर सरकारी स्कूलों की व्यवस्था कई जगहों पर कमजोर है, जहां शिक्षकों और संसाधनों की कमी बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की ऊंची फीस गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद कर रही है। नतीजतन, कई बच्चे स्कूल छोड़कर छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हो जाते हैं।

देश में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के उद्देश्य से लागू शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई) के बावजूद जमीनी हकीकत संतोषजनक नहीं दिखती। इस कानून के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। साथ ही निजी स्कूलों को 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं, जिसका खर्च सरकार वहन करती है। हालांकि, कई सामाजिक संगठनों का आरोप है कि निजी स्कूल इस नियम का पूरी तरह पालन नहीं कर रहे हैं।

शिक्षा के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका !

आरटीई के तहत दाखिले से बचने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर कार्रवाई का प्रावधान जरूर है, जिसमें मान्यता रद्द करने और 25 हजार से 50 हजार रुपये तक जुर्माने की बात कही गई है, लेकिन इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सवालों के घेरे में है। आरटीई के तहत स्कूलों के लिए कई जरूरी मानक भी तय किए गए हैं, जैसे प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षक-छात्र अनुपात 1:30, पर्याप्त कक्षाएं, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, खेल का मैदान और पुस्तकालय जैसी सुविधाएं। बावजूद इसके, इन मानकों का पालन भी कई जगह अधूरा नजर आता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था को संतुलित और सुलभ बनाना है तो सरकार को निजी स्कूलों की फीस संरचना पर सख्त निगरानी करनी होगी।

साथ ही सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार करना बेहद जरूरी है, ताकि आम परिवारों के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा मिल सके। नए सत्र से पहले अभिभावकों की उम्मीदें प्रशासन से बढ़ गई हैं। उनका साफ कहना है कि शिक्षा को व्यवसाय नहीं, सेवा का माध्यम बनाया जाए। जब तक फीस और अन्य खर्चों पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक ‘शिक्षा का अधिकार’ केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा और लाखों बच्चों का भविष्य आर्थिक बोझ तले दबता रहेगा।

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