(रणभेरी): देश की टेक सिटी एक बार फिर सामाजिक बहस के केंद्र में है। यहां एक महिला इन्फ्लुएंसर को उसके पहनावे को लेकर सरेआम फटकार लगाए जाने का मामला सामने आया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद “मोरल पुलिसिंग” को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई।
जानकारी के मुताबिक, इन्फ्लुएंसर श्रियांशी शहर में एक वीडियो शूट कर रही थीं। इसी दौरान वहां मौजूद एक बुजुर्ग महिला ने उनके कपड़ों पर आपत्ति जताते हुए उन्हें सार्वजनिक स्थान पर इस तरह का पहनावा न अपनाने की नसीहत दे डाली। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बुजुर्ग महिला ने कन्नड़ भाषा में नाराजगी जताते हुए कहा कि “छोटे कपड़े महिलाओं पर अच्छे नहीं लगते” और उन्हें चूड़ीदार या फुल पैंट पहननी चाहिए।
घटना के वक्त श्रियांशी शांत रहीं और उन्होंने किसी तरह की तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। हालांकि, मौके पर मौजूद लोगों ने इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बना लिया, जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। बताया जा रहा है कि वीडियो को लाखों बार देखा गया, लेकिन बाद में इन्फ्लुएंसर ने इसे अपने अकाउंट से हटा दिया।
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों के अनुसार, श्रियांशी दिल्ली और बेंगलुरु के बीच सक्रिय एक मॉडल और कंटेंट क्रिएटर हैं। वह शहर में “अर्बन लाइफ स्ट्रेस” पर एक वीडियो शूट कर रही थीं। इस दौरान उन्होंने सफेद टॉप, काले शॉर्ट्स और फर वाले बूट्स पहन रखे थे। जैसे ही शूटिंग शुरू होने वाली थी, साड़ी पहने एक बुजुर्ग महिला ने हस्तक्षेप करते हुए उनके पहनावे पर सवाल उठा दिए। बुजुर्ग महिला ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें सड़क पर वीडियो शूटिंग से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उनका विरोध केवल “छोटे कपड़ों” को लेकर है।
सोशल मीडिया पर बंटी राय
इस घटना के सामने आते ही सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया। एक वर्ग ने बुजुर्ग महिला का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने केवल अपनी राय रखी और किसी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं किया। वहीं, दूसरे पक्ष ने इसे महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल बताते हुए कड़ी आलोचना की।
कुछ यूजर्स ने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के वीडियो “व्यूज” और “रीच” बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं। वहीं कई लोगों ने यह तर्क दिया कि युवाओं को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का पूरा अधिकार है और सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह की दखलंदाजी उचित नहीं है।
फिर उठे सवाल: आज़ादी बनाम ‘संस्कृति’
बेंगलुरु की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सार्वजनिक स्थानों पर किसी के पहनावे पर टिप्पणी करना उचित है? क्या यह “संस्कृति की रक्षा” है या व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं समाज में मौजूद सोच के टकराव को उजागर करती हैं-जहां एक ओर पारंपरिक मान्यताएं हैं, वहीं दूसरी ओर नई पीढ़ी अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ आगे बढ़ना चाहती है।
