- *आयोजन तो है लेकिन अब पहले जैसे माहौल नहीं रहा
- *कभी यहां गूंजा करता था नामचीन गायक-गायिकाओं का संगीत
- *अब नहीं रहे वैसे गायक व गायिकाएं न ही रहे उस जमाने के रईस
- *बुढ़वा मंडल को संजोये रखने की है जरुरत
राधेश्याम कमल
वाराणसी (रणभेरी): फूलों की लड़ियों से सजे बजड़े, उस पर बिछायी गई चांदनी-मसनद, शमादान और गलीचे पर सजी संगीत की महफिल। माहौल में फैली गुलाब की भीनी-भीनी खुशबू। लाल-पीले व गुलाल से रंगे चेहरे। कुछ ऐसा ही नजारा काशी के बुढ़वा मंगल का देखने में आता है। होली के दूसरे मंगलवार को बुढ़ावा मंगल मनाया जाता है। एक बड़े बजड़े पर बुढ़वा मंगल की महफिल सजायी जायेगी। काशी में गीत, गुलाल और खुशियों के साथ बुढ़वा मंगल का अनोखा जश्न मनाया जाता है। यह काशी की अति प्राचीन संस्कृति एवं परम्परा का ही प्रतीक है।
जब लोग अपने घरों से निकल कर बनारस के गंगा घाट तक पहुंचते हैं और बजड़े पर सजी संगीत की महफिल में रंग-अबीर -गुलाल के साथ खुशियों में शरीक होते हैं। कहते हैं कि बनारस के लोगों में होली के बाद एक अजीब सी खुमारी छायी रहती है, जो शायद बुढ़वा मंगल के दिन समाप्त होती है। यह परम्परा कई साल पुरानी है जिसे काशी आज भी संयोए हुए है। बुढ़वा मंगल को लोग होली के समापन के रुप में देखते हैं।
इस बार 17 मार्च 2026 मंगलवार को सुबह-ए- बनारस की ओर से बुढ़वा मंगल नया अस्सी घाट के सामने बजड़े पर मनाया जा रहा है। इसमें सायंकाल 4 बजे से काव्यार्चन, सायंकाल 6 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम में होरी, चैती, दादरा व धमार आदि कार्यक्रम होंगे। कार्यक्रम संयोजक डा. रत्नेश वर्मा बताते हैं कि हम बुढ़वा मंगल की अति प्राचीन परम्परा को जीवित रखने के लिए इस आयोजन को कर रहे हैं। यह आयोजन हालंकि उस जमाने की तरह तो नहीं है लेकिन फिर भी हम इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। इस आयोजन में पुरूष सफेद कुर्ता व पायजामा व महिलाएं गुलाबी या हल्के रंग के परिधान में आयें।
एक जमाना था जब बजड़ों पर बुढ़वा मंगल की महफिल सजती थी
एक जमाना था जब बुढ़वा मंगल पर गंगा के बीच बड़े-बड़े बजड़ों पर बुढ़वा मंगल की महफिल सजती थी। जिसमें कई नामी-गिरामी गायिकाएं, सिद्धहस्त गायक व संगीतज्ञ जुटते थे। बनारस के कई नामी गिरामी रईस बुढ़वा मंगल में शरीक होकर इसकी शान को बढ़ाते थे। लेकिन अब न तो वह कलाकार रहे और न ही बनारस में अब वह रईस ही रह गये। बुढ़वा मंगल पहले बनारस के रईस यह आयोजन किया करते थे। बाद में इस आयोजन को प्रशासन ने अपने जिम्मे ले लिया। बनारस में बुढ़वा मंगल के आयोजन को लेकर कई तरह की भाँतियां हैं।
कुछ लोगोंं का कहना है कि इस मेले की शुरुआत 1770 में मीर रुस्तम अली ने की थी। कुछ लोगों का मानना है कि इसकी शुरुआत राजा चेतसिंह ने की थी। लेकिन लोगों का कहना है कि बुढ़वा मंगल राजा चेतसिंह के पहले से चल रहा है। उनका मानना है कि राजा चेतसिंह ने बुढ़वा मंगल को निखारा होगा। बहरहाल उस जमाने के बुढ़वा मंगल की कल्पना करके आज भी लोग रोमांचित हो उठते हैं।
जरा कल्पना करिये गंगा के मध्य सजे हुए बड़े-बड़े पटेले (बजड़ा) उस पर सजा हआ शामियाना, उसमें लगे हुए झूमर, नर्तकियां, गायक-गायिकाएं, कमर में बांध कर तबला बजाते हुए कलाकार, बजड़े पर लकदक कुर्ता व दुपलिया टोपी पहने बनारस के रईस, बजड़े पर उड़ता हुआ अबीर गुलाल साथ ही भंग बूटी की तरंग में झूमता हुआ हर शख्स। अर्धरात्रि में जब बुढ़वा मंगल के बजड़े पर बनारस की गायिकाएं जब चैत की निदिया अलसानी हो रामा सुनाती थी तो उसकी गूंज गंगा के दोनों तटों को चीरती हुई काफी दूर तक गूंजती रहती थी।
रात भर गायिकाओं का चलता रहता था गायन
बुढ़वा मंगल में कभी गायिकाओं में बड़ी मेती, छोटी मोती, जद्दनबाई, हुस्ना बाई, छप्पनछुरी आदि का नाच-गाना रात भर चलता रहता था। मीरघाट से लेकर चौसट्टीघाट तक बड़े-बड़े बजड़ों को जोड़ कर गंगा के मध्य में एक बड़ा मंच बनाया जाता था। जिस पर बनारस के रईसों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राजवैद्य पं. शिवकुमार शास्त्री के पूर्वज, राजा मोतीचंद, भद्दोमल कोठी के रईस समेत न जाने कितने ही रईस आते थे। बजड़े पर इत्र, फुलेल, ठंडई कसेरु का शर्बत, भांग बूटी आदि का आयोजन होता था।
बुढ़वा मंगल के तीन चित्र आज भी हैं संरक्षित
बुढ़वा मंगल के चीन चित्र आज भी सुरक्षित व संरक्षित है। इसमें जेम्स प्रिंसेप का चित्र जो बनारस दृश्यावली में है। यह चित्र 1825-30 का होगा। इसमें कुछ सजी हुई नावें या पटेले (बजड़ा) रामनगर दुर्ग क छाया में दिखायी गई है। संभवत इसमें काशी नरेश की नाव सबसे प्रमुख है। उस पर नृत्य गीत-संगीत हो रहा है। दो चार पटेले हैं। दूसरा चित्र स्वयं काशीनरेश के संग्रहालय में है। इसमें नावों की जमघट काफी अच्छी है। तीसरा चित्र चौखम्भा स्थित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के भारतेन्दु भवन का है। जहां पर आज भी बुढ़वा मंगल का चित्र टंगा है। इसमें नावोें की भीड़भाड़ भी है। बुढ़वा मंगल का यह दृश्य सिंधिया घाट का है। इसमें ग्वालियर महराज के सिंधिया घाट के पार्श्ववर्ती गंगा महल का अंकन है
यह चित्र 1840-50 का बताया जाता है। कहते हैं कि उस जमाने में सामान्य लोग नावों-डोगियों पर न जा सकते थे, इस मेले के साथ-साथ घरों पर इकट्ठे होकर साथ-साथ चलते जाते थे। उस समय गायिकाओं की ऐसी ऊंची आवाज होती थी जिसे टीप कहते थे। जो गंगा के उस पार तक सुनायी देती थी। वह युग बिजली की चकाचौंध व लाउडस्पीकर की चीत्कार से दूर था। लिहाजा मद्धिम रोशनी के प्रकाश में कर्णप्रिय संगीत की दूर तक फेलती हुई स्वरलहरियों का लोग आनंद उठाते थे।
