वाराणसी (रणभेरी): काशी की शैक्षणिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक विवादों के घेरे में आ गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोप लगा है कि पिछले दो दशकों से बिना विधिक स्वीकृति के केंद्रीय सिविल सेवा (CCS) आचरण नियम 1964 और CCS (CCA) नियम 1965 लागू कर दिए गए और इन्हीं के आधार पर सैकड़ों शिक्षकों व कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई।
आरटीआई के माध्यम से सामने आए दस्तावेज़ों के अनुसार विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई कार्यकारी परिषद (Executive Council) ने इन नियमों को औपचारिक रूप से कभी अपनाया ही नहीं। इसके बावजूद लगभग 20 वर्षों में 500 से अधिक शिक्षकों और कर्मचारियों पर इन्हीं नियमों के तहत कार्रवाई किए जाने का दावा किया गया है।

इस संबंध में प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए डॉ. ओम शंकर ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2007 में तत्कालीन रजिस्ट्रार द्वारा जारी एक पत्र के आधार पर इन नियमों को पूरे विश्वविद्यालय पर लागू दिखाया गया, जबकि विश्वविद्यालय के अधिनियम के अनुसार ऐसे किसी भी नियम को लागू करने के लिए कार्यकारी परिषद की औपचारिक स्वीकृति अनिवार्य होती है।
डॉ. ओम शंकर का आरोप है कि जिस पत्र के आधार पर यह व्यवस्था लागू दिखाई गई, वह शुरुआत से ही कानूनी रूप से अमान्य था। इसके बावजूद उसी पत्र को आधार बनाकर वर्षों तक शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई होती रही।
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी उल्लेख किया गया है कि उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों—Prof. Yashpal v. State of Chhattisgarh और Dr. Suchitra Mitra v. Union of India-में स्पष्ट किया जा चुका है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों पर CCS आचरण नियम स्वतः लागू नहीं होते।

डॉ. ओम शंकर ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के कुछ अधिकारियों ने इन्हीं नियमों का हवाला देकर कई शिक्षकों और कर्मचारियों को निलंबित किया, सेवा से निष्कासित किया तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगाया।
उन्होंने मांग की है कि पिछले 20 वर्षों में CCS नियमों के आधार पर की गई सभी अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की निष्पक्ष जांच कर उन्हें निरस्त किया जाए तथा जिन कर्मचारियों को इससे नुकसान हुआ है, उन्हें सम्मानपूर्वक सेवा में बहाल किया जाए।
इस मामले के सामने आने के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और वैधानिकता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकता है।
