- गैस संकट से ठप हुई बनारस की ‘कचौड़ी-जलेबी’ संस्कृति, करीब 70 फीसद दुकानें बंद
- कमर्शियल सिलेंडर की किल्लत से कचौड़ी गली और ठठेरी बाजार में पसरा सन्नाटा
- अन्नपूर्णा अन्नक्षेत्र में पीएनजी कनेक्शन की तैयारी, सिलेंडर निर्भरता से मिलेगी राहत
- हॉस्टलों, घरों और शादियों तक असर, लकड़ी-कोयले पर लौट रही रसोई
वाराणसी (रणभेरी): धर्म, संस्कृति और खान-पान के लिए विश्वविख्यात काशी इन दिनों एक गंभीर ‘गैस संकट’ से जूझ रही है। कमर्शियल और घरेलू गैस सिलेंडरों की किल्लत ने बनारस की सुबह की पहचान मानी जाने वाली कचौड़ी-जलेबी की परंपरा पर ही ब्रेक लगा दिया है। हालात यह हैं कि शहर की संकरी गलियों में स्थित करीब 70 प्रतिशत प्रसिद्ध कचौड़ी और मिष्ठान की दुकानें बंद हो गई हैं। इससे न केवल स्थानीय कारोबार प्रभावित हुआ है बल्कि शहर की ‘स्वाद यात्रा’ पर आने वाले पर्यटकों को भी निराशा का सामना करना पड़ रहा है।
रविवार को कचौड़ी गली, ठठेरी बाजार, मणिकर्णिका घाट और गोलघर जैसे इलाकों का दृश्य बदला-बदला नजर आया। ठठेरी बाजार स्थित प्रसिद्ध श्रीराम भंडार और सत्यनारायण मिष्ठान समेत कई दुकानों पर मिठाइयों के काउंटर लगभग खाली दिखाई दिए। दुकानदारों का कहना है कि कमर्शियल गैस न मिलने से उत्पादन ठप हो गया है। कुछ प्रतिष्ठानों ने मजबूर होकर शटर गिरा दिए हैं, जबकि कई दुकानदार लकड़ी की भट्ठियां जलाकर सीमित मात्रा में काम चला रहे हैं।

राम मिष्ठान भंडार के संचालक कृष्ण कुमार गुप्ता बताते हैं कि गैस की अनुपलब्धता ने लागत और मेहनत दोनों बढ़ा दी हैं। पहले जहां गैस से जल्दी काम हो जाता था, वहीं अब लकड़ी और कोयले के सहारे काम करना पड़ रहा है, जिससे समय भी अधिक लग रहा है और खर्च भी बढ़ रहा है।

इस संकट के बीच मां अन्नपूर्णा के भक्तों के लिए राहत की खबर भी सामने आई है। मंदिर के अन्नक्षेत्र में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। भोजन व्यवस्था बाधित न हो, इसके लिए प्रशासन की मदद से 20 गैस सिलेंडर उपलब्ध कराए गए थे। अब भविष्य में ऐसी समस्या से बचने के लिए मंदिर प्रशासन ने पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) का विकल्प चुना है। अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकर पुरी ने बताया कि गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए सर्वे पूरा हो चुका है और सोमवार शाम तक कनेक्शन चालू होने की संभावना है। पीएनजी कनेक्शन शुरू होने से मंदिर परिसर में आधुनिक रसोई का संचालन संभव होगा और सिलेंडर पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी।

गैस संकट का असर शहर के हॉस्टलों और घरों तक भी पहुंच गया है। भेलूपुर, दुर्गाकुंड और साकेतनगर क्षेत्र के करीब 40 हजार छात्रों के हॉस्टलों में रोटियों की संख्या कम कर दी गई है और मेन्यू में चावल बढ़ा दिया गया है। कई जगह इंडक्शन चूल्हे और कोयले की भट्ठियों का सहारा लिया जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में भी स्थिति कम गंभीर नहीं है। गैस न मिलने से उपलों (गोइठा) की कीमतें बढ़कर करीब 400 रुपये प्रति सैकड़ा तक पहुंच गई हैं। शादियों के सीजन और रमजान के बीच यह संकट लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। ऐसे में काशी के लोग अब गैस आपूर्ति सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि शहर की गलियों में फिर से कचौड़ी छनने की खुशबू लौट सके।
