19 साल बाद दुर्लभ खगोलीय संयोग, चंद्रग्रहण के साए में होली का उत्सव
वाराणसी (रणभेरी): इस बार होली एक अनोखे ज्योतिषीय और खगोलीय घटनाक्रम में मनाई जाएगी, क्योंकि लगभग 19 साल बाद ऐसा दुर्लभ संयोग आया है जब होली से ठीक पहले चंद्रग्रहण का प्रभाव दिखाई देगा। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, यह ग्रहण 3 मार्च को शाम को भारत में लगभग 48 मिनट तक दृश्यमान रहेगा, हालांकि प्रारंभिक चरण दोपहर 3:20 बजे से शुरू होगा लेकिन चंद्रोदय के बाद ही इसका मोक्ष देखा जा सकेगा।
ग्रहण की वजह से इस वर्ष होली का रंगों भरा उत्सव 4 मार्च को ही मनाया जाएगा, जबकि होलिका दहन 2 मार्च की मध्य रात्रि 12:50 से 2:02 बजे के बीच शास्त्र सम्मत काल में संपन्न होगा। शास्त्राचार्यों के अनुसार, ग्रहण और भद्रा के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए दहन का यह समय सर्वाधिक शुभ माना गया है। परंपरा के अनुसार काशी में आम तौर पर फाल्गुन पूर्णिमा को होली खेली जाती है, लेकिन इस बार पूर्णिमा पर ग्रहण होने के कारण काशी के समेत पूरे देश में होलोत्सव प्रतिपदा तिथि यानी 4 मार्च को ही आयोजित होगा।
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय और आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री का कहना है कि ग्रहण के समय सुतिकाल 3 मार्च की सुबह 6:20 बजे से प्रभावी रहेगा, जिससे मंदिरों के कपाट बंद होंगे और शुद्धिकरण के बाद ही शाम 6:45 बजे के बाद दर्शन संभव होंगे। इसके पूर्व 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार और गौना की रस्म अंजाम दी जाएगी, जबकि 28 फरवरी को मणिकर्णिका घाट पर ‘मसाने की होली’ का आयोजन किया जाएगा, जिसकी तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। ग्रहण और सूतक के बावजूद काशी में होली का उल्लास चरम पर रहेगा, बस समय और विधान में ज्योतिषीय मान्यताओं का सम्मान किया जाएगा।
