- रामनगर की रात जागती रही, श्रीराम के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब
- सुबह 5:48 बजे सूर्य की पहली किरण के साथ सजी दिव्य आरती
- दीपों की लौ, घंटियों की गूंज और रामनाम में डूबा अयोध्या मैदान
- पीढ़ियों से जीवंत परंपरा, काशीराज परिवार ने निभाई विरासत
“कुछ रातें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुबह होने की जल्दी नहीं होती। कुछ पल ऐसे होते हैं, जिन्हें देखने के लिए आंखें ही नहीं, आत्मा भी सदियों तक प्रतीक्षा करती है। रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में आने वाली वह अलौकिक भोर भी कुछ ऐसी ही है, जब रात अपनी आखिरी सांसें गिन रही होती है, पूरब का आकाश धीरे-धीरे उजास से भरने लगता है और लाखों हृदयों की धड़कनों में एक ही नाम गूंजता है…जय श्रीराम!”
वाराणसी (रणभेरी): काशी की धरती पर आस्था के असंख्य रंग बिखरते हैं, लेकिन रामनगर की इस भोर का रंग सबसे निराला है। यहां सुबह केवल सूरज की किरणों के साथ नहीं आती, बल्कि प्रभु श्रीराम के दर्शन की उत्कंठा, आंखों में प्रतीक्षा के दीप और हृदय में अटूट श्रद्धा लेकर उतरती है। यह वह रात है, जिसमें जागती हुई आंखें सुबह का स्वागत करने के लिए पलकें बिछाए रहती हैं। यह वह बेला है, जब समय मानो ठहर जाता है और रामभक्ति की धारा में बहती काशी स्वयं को धन्य समझती है।
रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद रविवार की रात भी कुछ ऐसी ही भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक रंगों में डूबी रही। नगर की सड़कें रातभर गुलजार रहीं। जगह-जगह आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में श्रद्धालु और लीलाप्रेमी सपरिवार शामिल होते रहे। किसी की आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, तो किसी के मन में बस एक ही अभिलाषा थी- भोर हो, प्रभु के दर्शन हों और जीवन की स्मृतियों में वह दिव्य दृश्य हमेशा के लिए बस जाए। फिर घड़ी की सुइयों ने सुबह 5 बजकर 43 मिनट का स्पर्श किया।
काशीराज परिवार के अनन्त नारायण सिंह किले से बाहर आए। अगले ही क्षण रामनगर की हवाओं में हर-हर महादेव का उद्घोष गूंज उठा। जयघोष की लहरें गलियों से उठीं और जनसमुद्र के ऊपर से होती हुई मानो आकाश तक जा पहुंचीं। भीड़ का आलम ऐसा कि सड़कें श्रद्धा से भर गईं। लोग आगे बढ़ रहे थे, लेकिन हर मन अपने आराध्य के दर्शन की उस एक झलक पर ठहरा हुआ था, जिसके लिए पूरी रात जागकर बिताई गई थी।

काशीराज परिवार के अनन्त नारायण सिंह अपने राजपरिवार के सदस्यों और दरबारियों के साथ दुर्ग से पैदल अयोध्या मैदान की ओर बढ़े। यह केवल एक परंपरा का निर्वहन नहीं था, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दृश्य था, जिसमें राजपरिवार, रामलीला और जनआस्था एक ही सूत्र में बंधे दिखाई देते हैं।
और फिर आई वह घड़ी, जिसके इंतजार में रात ने अपना पूरा आंचल बिछा दिया था। सुबह 5 बजकर 48 मिनट पर भगवान भास्कर ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, पूरब की लालिमा ने धरती को स्पर्श किया। आकाश में बिखरती सूर्य की पहली किरणों के बीच अयोध्या के सिंहासन पर विराजमान प्रभु श्रीराम और माता सीता की दिव्य छवि निखर उठी। समीप खड़े भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तथा प्रभु श्रीराम के चरणों में नतमस्तक भक्त शिरोमणि हनुमान। दृश्य ऐसा, मानो त्रेतायुग ने समय की सीमाएं लांघकर रामनगर की धरती पर एक बार फिर अपने चरण रख दिए हों।

माता कौशल्या ने प्रभु श्रीराम की आरती उतारी। दीपों की लौ थरथराई, घंटियों की ध्वनि वातावरण में घुली और श्रद्धा से झुके सिरों के बीच भक्ति का एक ऐसा महासागर उमड़ा, जिसकी गहराई शब्दों में समेट पाना कठिन है। सामने प्रभु का राजसी स्वरूप, पीछे उगते सूर्य की सुनहरी आभा और चारों ओर रामनाम में डूबा जनसमुदाय। उस क्षण मानो भोर स्वयं ठिठककर खड़ी हो गई हो, जैसे सूर्य की पहली किरण भी प्रभु श्रीराम के दर्शन किए बिना आगे बढ़ना नहीं चाहती हो।
यही है रामनगर की वह विख्यात भोर वाली आरती, जिसके दर्शन के लिए काशी से लेकर दूर-दराज के क्षेत्रों तक के श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। लख्खा मेले में शुमार इस अनुपम आयोजन को देखने के लिए अयोध्या मैदान और आसपास के भवनों पर लीलाप्रेमी देर रात से ही डटे रहे। सपरिवार पहुंचे श्रद्धालुओं ने रंग-बिरंगी महताबी की लाल और श्वेत रोशनी में सजे इस अलौकिक दृश्य को अपनी आंखों में उतारा और मानस पटल पर हमेशा के लिए अंकित कर लिया।
किसी ने जुड़े हुए हाथों से प्रभु को प्रणाम किया, किसी की आंखें भावविभोर होकर नम हो उठीं और किसी के होंठों पर अनायास ही रामनाम आ गया। वहां उपस्थित हर व्यक्ति के लिए वह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था से साक्षात्कार का क्षण था। वह क्षण, जिसे तस्वीरों में कैद तो किया जा सकता है, लेकिन जिसकी अनुभूति केवल हृदय में ही जीवित रह सकती है।

काशीराज परिवार के अनन्त नारायण सिंह ने भी खड़े होकर श्रीराम राज्याभिषेक की आरती के दर्शन किए और अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपरा का निर्वहन किया। उनके लिए यह विरासत का सम्मान था, तो रामभक्तों के लिए सदियों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का साक्षात दर्शन।
आरती की परंपरा पूर्ण हुई। हर-हर महादेव के उद्घोष फिर वातावरण में गूंजे। अनन्त नारायण सिंह हवाखोरी के लिए निकले और उधर रामलीला का अगला प्रसंग आगे बढ़ा। श्रीराम को कंधे पर उठाए बजरंग बली तथा सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के स्वरूपों को कंधों पर उठाए भक्तों के साथ पांचों स्वरूप बाजार भ्रमण के प्रसंग को पूर्ण कराने के लिए लीलास्थल से बलुआघाट स्थित धर्मशाला की ओर चले।
रामनगर की गलियों ने एक बार फिर उस दृश्य को अपने भीतर समेट लिया, जिसे देखने के लिए हजारों-लाखों आंखें रातभर जागती रही थीं। सूरज अब आसमान में ऊपर उठने लगा था, लेकिन रामभक्तों के मन में भोर वाली आरती का उजाला अभी-अभी जन्मा था।
काशी की यह विशेषता है कि यहां परंपराएं केवल निभाई नहीं जातीं, उन्हें जिया जाता है। यहां रामलीला केवल मंच पर घटित होने वाला प्रसंग नहीं, बल्कि जनमानस में प्रवाहित होती जीवंत आस्था है। रामनगर की भोर वाली आरती इसी परंपरा का ऐसा अनुपम अध्याय है, जहां रात की नीरवता रामनाम से टूटती है, उगते सूर्य की लालिमा प्रभु के चरणों में नतमस्तक होती प्रतीत होती है और लाखों हृदय एक साथ भक्ति के सुर में धड़कने लगते हैं।
यहां भोर केवल होती नहीं है, प्रभु श्रीराम के चरणों में अपना शीश नवाती है। यहां सूर्य केवल उदित नहीं होता, रामभक्ति के उजास में अपनी पहली किरण बिखेरता है। और यहां आने वाले श्रद्धालु केवल आरती के दर्शन करके नहीं लौटते, वे अपने हृदय में एक ऐसी स्मृति लेकर जाते हैं, जो बरसों बाद भी आंखें बंद करते ही जीवंत हो उठती है।
शायद इसीलिए रामनगर की इस भोर का इंतजार केवल लोगों को नहीं रहता। इस रात में जागती गलियां, प्रतीक्षा में डूबा जनसमुद्र और पूरब से झांकता सूरज भी मानो उसी एक क्षण की राह देखते हैं- जब दीपों की लौ के सामने प्रभु श्रीराम विराजते हैं और समूची काशी के हृदय से एक ही स्वर उठता है…जय श्रीराम!
