वाराणसी (रणभेरी): काशी की धरती पर आस्था के अनेक रंग हैं, लेकिन रामनगर किले में विराजमान दक्षिणमुखी काले हनुमान जी के दर्शन की परंपरा अपने आप में अनूठी है। यहां बजरंगबली के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को पूरे साल प्रतीक्षा करनी पड़ती है, क्योंकि मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए साल में केवल एक दिन खुलते हैं।
रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला में श्रीराम के राज्याभिषेक के अगले दिन, भोर की आरती के बाद, जैसे ही काले हनुमान जी के दर्शन का अवसर मिलता है, किले के मुख्य द्वार पर श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। किसी के होंठों पर हनुमान चालीसा की चौपाइयां होती हैं, तो किसी की आंखों में अपने आराध्य को निहारने की व्याकुलता।
हर हृदय बस उस एक क्षण की प्रतीक्षा करता है, जब संकटमोचन के चरणों में शीश नवाने का सौभाग्य प्राप्त हो।
काले पत्थर से निर्मित बजरंगबली की यह दक्षिणमुखी प्रतिमा दुर्लभ मानी जाती है। मान्यता है कि रामनगर किले के निर्माण के दौरान खुदाई में यह प्रतिमा प्राप्त हुई थी। यही वजह है कि यहां दर्शन की परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है।
किले के भीतर विराजमान महाबली के सम्मुख जब भक्त हाथ जोड़कर खड़े होते हैं, तो उनकी आंखों में श्रद्धा और हृदय में अटूट विश्वास दिखाई देता है। कोई मौन प्रार्थना करता है, तो कोई अपने कष्टों से मुक्ति की कामना लेकर प्रभु के चरणों में नतमस्तक होता है। उस क्षण मानो हर मन से एक ही पुकार उठती है, हे बजरंगबली! अपनी कृपा बनाए रखना।
रामनगर की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। कपाट भले ही साल में एक दिन खुलते हों, लेकिन भक्तों के हृदय में काले हनुमान जी के प्रति श्रद्धा सदैव अटूट रहती है।
