वाराणसी (रणभेरी): मातृ शक्ति भगवती मां दुर्गा की आराधना का महापर्व शारदीय नवरात्र का शुभारंभ 11 अक्टूबर रविवार को हो रहा है। जो कि 20 अक्टूबर मंगलवार तक रहेगा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 19 अक्टूबर सोमवार, नवमी तिथि 20 अक्टूबर मंगलवार तथा 21 अक्टूबर बुधवार को विजयादशमी मनायी जायेगी। प्रख्यात ज्योतिषविद् पं. विमल जैन के मुताबिक नवरात्र में दुर्गा सप्तशती के अनुसार मां भगवती की पूजा- अर्चना श्रद्धा एवं धार्मिक आस्था व भक्तिभाव से की जाती है। जिससे सुख-सौभाग्य में अभिवृद्धि होती है। जीवन धनधान्य से परिपूर्ण रहता है। शरद ऋतु में दुर्गाजी की महापूजा से सभी प्रकार की बाधाओं की निवृत्ति होती है। शारदीय नवरात्र में विशेष कर शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा, काली, लक्ष्मी व सरस्वती की विशेष आराधना फलदायी मानी जाती है।
मां दुर्गा के नव स्वरुपों की होगी पूजा
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के नव स्वरूपों की पूजा की जायेगी। इनमें प्रथम- शैलपुत्री, द्वितीय- ब्रह्मचारिणी, तृतीय चन्द्रघंटा, चतर्थ कुष्मांडा, पंचम स्कंदमाता, षष्ठ- कात्यायनी, सप्तम-कालरात्रि, अष्टम- महागौरी व नवम- सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना की जायेगी। भगवती की अनुकंपा पाने के लिए शुभ मुहुर्त में कलश स्थापना करके सम्पूर्ण नवरात्र में व्रत या उपवास रख कर दुर्गासप्तशती के पाठ व मंत्र का जप करना कल्याणकारी रहता है। दुर्गासप्तशती के एक पाठ से फल सिद्धि,तीन पाठ से उपद्रव शांति,पांच पाठ से सर्वशांति, सात पाठ से भय से मुक्ति, नौ पाठ से यज्ञ के समान फल की प्राप्ति , ग्यारह पाठ से राज्य की प्राप्तिबारह पाठ से कार्य सिद्धि,चौदह पाठ से वशीकरण, पन्द्रह पाठ से सुख सम्पति, सोलह पाठ से धन व पुत्र की प्राप्ति, सत्रह पाठ से राजभय व शत्रु तथा रोग से मुक्ति, 18 पाठ से प्रिय की प्राप्ति व 20 पाठ से ग्रह दोष शांति, 25 पाठ से समस्त बंधन से मुक्ति होती है।
किस मुहुर्त में करें कलश स्थापना
प्रसिद्ध ज्योतिषविद् पं. विमल जैन ने बाताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस बार कलश स्थापना का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहुर्त 11.36 मिनट से 12.24 मिनट तक (अभिजीत मुहुर्त) है। इस बार 11 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र रात्रि 10.33 मिनट तक तथा वैधृति योग (भद्रा) रात्रि 9. 06 तक रहेगा। इस योग में कलश स्थापना नहीं की जाती है।
