- पुत्र के दीर्घायु होने की कामना को लेकर महिलाएं रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत
- महालक्ष्मी के दर्शन-पूजन से एवं व्रत वैभव व ऐश्वर्य की प्राप्ति
- लक्ष्मीकुंड पर उमड़ेगी हजारों महिलाओं की भीड़
वाराणसी (रणभेरी): हिंदू सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार चान्द्र मास के विशिष्ट तिथियों पर किये जाने वाले व्रत-उपवास एवं दर्शन-पूजन से मनोकामना की पूर्ति तो होती ही है साथ ही सुख- सौभाग्य में अभिवृद्धि भी होती है। भगवती श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए रखा जाने वाला महालक्ष्मी व्रत 3 अक्टूबर शनिवार को हर्ष व उमंग तथा उल्लास के साथ मनाया जायेगा। इस दिन लक्ष्मीकुंड स्थित महालक्ष्मी मंदिर एवं पोखरे पर व्रती महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ेगी। इसी दिन महालक्ष्मी का भव्य शृंगार किया जायेगा।
ज्योतिषविद् पं. विमल जैन ने बताया कि पुत्र के दीर्घायु एवं आरोग्य के लिए महिलाएं जीवित्पुत्रिका व्रत रखती हैं। जीवित्पुत्रिका का व्रत वह महिलाएं रखती हैं। जिनके पुत्र जीवित नहीं रहते अथवा अल्पायु रहते हो। धार्मिक पारिवारिक रीति रिवाज के अनुसार व्रत व्रत के प्रारंभ में उड़द के साबूत दाने व्रती महिलाएं निगल कर व्रत प्रारंभ करती हैं। इसके पश्चात अन्न-जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता है। यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। आश्विन पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर शनिवार को प्रात:काल 8.01 मिनट पर लगेगी। इसी दिन महालक्ष्मी व्रत एवं जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जायेगा। महालक्ष्मंी की महिमा में रखा जाने वाला सोरहिया व्रत का भी इसी समापन हो जायेगा।
व्रत एवं पूजन का विधान
इसी दिन जीमूतवाहन की भी पूजा अर्चना करने का विधान है। इस दिन जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा का श्रवण किया जाता है। इस दिन प्रात:काल ब्रह्म मुहुर्त में उठ कर अपने समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा अर्चना करने के पश्चात महालक्ष्मी के वंरत का संकल्प लेना चाहिए। नवमी तिथि के दिन व्रत का पारण किया जाता है। महालक्ष्मी के व्रत के पारण के पश्चात ब्राह्मण को भोजन करवा कर दान-दक्षिणा देना चाहिए।
जिउतिया धारण करने का विधान
इस दिन कच्चे सूत के साथ ही सोने-चांदी की जिउतिया धारण करने का विधान है। धागे का गंडा बना कर गंडे की रोली-अक्षत से विधि विधान पूर्वक पूजा की जाती है। व्रती महिलाएं जिउतिया का सूत्र पूजनोपरांत अपने गले में धारण करती हैं। जिउतिया सोने-चांदी की बनायी जाती है। जिउतिया लाल धागे के सूूत्र में पुत्र की संख्या के अनुसार धारण किया जाता है। रक्षासूत्र के रूप में पुत्र को भी गले में जिउतिया धारण करवाया जाता है। सोलह दिनों से चल रहे व्रत का पारण लक्ष्मीजी के दर्शन-पूजन के पश्चात किया जायेगा। इसेस जीवन में सुख समृद्धि एवं धन-ऐश्वर्य एवं वैभव का मार्ग प्रशस्त होता है।
