वाराणसी (रणभेरी): काशी की गलियों, घाटों और सांस्कृतिक पहचान को अपनी शहनाई की मधुर धुनों के जरिए देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले महान शहनाई वादक भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया जा रहा है। वाराणसी में उनके चाहने वाले और संगीत प्रेमी उनकी कला, सादगी और काशी से उनके गहरे रिश्ते को स्मरण कर रहे हैं। हालांकि, श्रद्धांजलि के इस अवसर पर उनके परिवार की मौजूदा परिस्थितियां भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
परिवार के अनुसार, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के पोते नासिर गंभीर स्वास्थ्य संकट से गुजर रहे हैं। बताया जा रहा है कि ब्रेन हेमरेज के बाद उनका उपचार चल रहा है। बीमारी के चलते परिवार के सामने इलाज का खर्च जुटाना चुनौती बन गया है। परिजनों का कहना है कि सीमित आर्थिक संसाधनों के कारण उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और इस मुश्किल समय में आर्थिक मदद की आवश्यकता है।
इलाज का खर्च बना बड़ी चुनौती
परिवार से जुड़े लोगों के मुताबिक नासिर के इलाज में लगातार खर्च हो रहा है। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए उपचार और दवाओं का खर्च परिवार की आर्थिक क्षमता पर भारी पड़ रहा है। परिजनों की उम्मीद है कि सरकार, प्रशासन और समाज के सक्षम लोग आगे आकर मदद करेंगे, जिससे बेहतर इलाज जारी रखा जा सके।
परिवार का आरोप है कि अभी तक सरकारी स्तर पर उनकी समस्या को लेकर अपेक्षित मदद नहीं पहुंची है। उनका कहना है कि जिस परिवार ने देश की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने पहचान दिलाने वाले कलाकार को जन्म दिया, उसी परिवार के सदस्य को आज इलाज के लिए आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
दालमंडी से जुड़ी हैं कई यादें
वाराणसी का दालमंडी इलाका भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और उनके परिवार की पुरानी स्मृतियों से जुड़ा रहा है। समय के साथ इलाके का स्वरूप बदल रहा है। पुराने मकानों और बस्तियों में हो रहे बदलाव के बीच परिवार की विरासत से जुड़े स्थानों को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं।
परिवार के सामने एक तरफ स्वास्थ्य संबंधी संकट है, तो दूसरी ओर उनकी पुरानी विरासत और उससे जुड़ी स्मृतियों को सुरक्षित रखने का सवाल भी खड़ा है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा होती रही है कि देश के महान कलाकारों की विरासत को केवल उनकी पुण्यतिथि या जयंती के अवसर पर याद करने के बजाय उससे जुड़े परिवार और स्थानों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
शहनाई को नई पहचान दिलाई
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई को केवल पारंपरिक वाद्य यंत्र के रूप में नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शास्त्रीय संगीत के बड़े मंच तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी शहनाई की धुनों ने वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान को भी नई ऊंचाई दी।
उनका जीवन काशी, संगीत और गंगा-जमुनी तहजीब से गहराई से जुड़ा रहा। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम भारतीय संगीत के इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी कला ने देश की सीमाओं से बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की पहचान मजबूत की।
विरासत के साथ परिवार की चिंता भी जरूरी
पुण्यतिथि के मौके पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को श्रद्धांजलि देने के साथ अब उनके परिवार की स्थिति भी लोगों का ध्यान खींच रही है। सवाल यह है कि महान कलाकारों की विरासत को संरक्षित करने की बात केवल स्मारकों, कार्यक्रमों और श्रद्धांजलि सभाओं तक सीमित रहनी चाहिए या उनके परिवार और उनसे जुड़े ऐतिहासिक स्थानों की वास्तविक स्थिति पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
परिजनों की ओर से इलाज के लिए मदद की अपील की जा रही है। ऐसे में प्रशासन और सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। परिवार का कहना है कि यदि एक महान कलाकार के परिजन को बीमारी के समय आर्थिक संकट से गुजरना पड़ रहा है, तो यह विरासत और कलाकारों के परिवारों के संरक्षण की व्यवस्था पर विचार करने का समय है।
काशी आज भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की यादों को अपने भीतर संजोए हुए है। उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि के बीच उनके परिवार की परेशानी ने एक गंभीर सवाल जरूर सामने ला दिया है। जिस कलाकार की कला और विरासत को देश गर्व के साथ याद करता है, क्या उसके परिवार की मुश्किल घड़ी में भी समाज और व्यवस्था उसी संवेदनशीलता के साथ उसके साथ खड़ी होगी
