15वें दीक्षांत समारोह में 62 विद्यार्थियों को मिले 124 मेडल और पुरस्कार, मुख्य अतिथि को डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि से किया गया सम्मानित
वाराणसी (रणभेरी): आईआईटी बीएचयू का 15वां दीक्षांत समारोह शनिवार सुबह 10 बजे उत्साह और गरिमामय माहौल में शुरू हुआ। आदित्य बिरला समूह के चेयरमैन कुमार मंगलम बिड़ला मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। मंगलाचरण मंत्रों के बीच उनका स्वागत किया गया। समारोह में संस्थान की ओर से उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस (डीएससी) की मानद उपाधि प्रदान की गई। इसके बाद उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को मेडल और पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
समारोह में कुल 2,048 विद्यार्थियों को विभिन्न पाठ्यक्रमों की उपाधियां प्रदान की गईं। इनमें बीटेक के 1,106, इंटीग्रेटेड डुअल डिग्री (आईडीडी) के 385, एमटेक और एमफार्मा के 322, पीएचडी के 182, एमएससी के 39 और बीआर्क के 14 विद्यार्थी शामिल रहे। वहीं, 62 विद्यार्थियों को कुल 124 मेडल और पुरस्कार दिए गए। इनमें एक प्रेसिडेंट्स गोल्ड मेडल और दो डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल शामिल हैं।
‘अपना टाइम आएगा, रिस्क नहीं तो कुछ नहीं’
दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कुमार मंगलम बिड़ला ने जेन-जी के बीच लोकप्रिय फिल्मी संवादों के जरिए विद्यार्थियों को सफलता और जिंदगी का मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में अपने फैसले खुद लेने का साहस होना चाहिए। जोखिम उठाए बिना कुछ बड़ा हासिल नहीं किया जा सकता। जिंदगी की खूबसूरती उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसके अनुभवों और उपलब्धियों में होती है।

उन्होंने युवाओं को तीन अहम संदेश देते हुए कहा- ‘अपना टाइम आएगा’, ‘रिस्क नहीं तो कुछ नहीं’ और ‘जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं’। इन संवादों के माध्यम से उन्होंने विद्यार्थियों को अपने सपनों पर भरोसा रखने, चुनौतियों का सामना करने और हर अवसर का बेहतर इस्तेमाल करने की प्रेरणा दी।
अगले 25 साल भारत और युवाओं के लिए निर्णायक
बिड़ला ने कहा कि करियर की शुरुआत के लिए मौजूदा समय बेहद रोमांचक है। खासकर भारत जैसे देश में युवाओं के सामने संभावनाओं का विशाल संसार खुला है। आने वाले 25 साल भारत की वैश्विक पहचान को नई दिशा दे सकते हैं। तकनीक, युवा आबादी, उद्यमिता और बढ़ती महत्वाकांक्षाएं देश के सामने ऐसे अवसर पैदा कर रही हैं, जिनकी कल्पना पिछली पीढ़ियां भी नहीं कर सकती थीं।
उन्होंने कहा कि जिस तरह देश के अगले 25 साल महत्वपूर्ण हैं, उसी तरह स्नातक हो रहे विद्यार्थियों के जीवन और करियर के अगले 25 साल भी निर्णायक होंगे। अवसर बड़े हैं तो जिम्मेदारियां भी उतनी ही बड़ी हैं। विद्यार्थियों को मेहनत, साहस और दूरदृष्टि के साथ इन अवसरों को उपलब्धियों में बदलना होगा।
नौकरी तक सीमित न रखें करियर
कुमार मंगलम बिड़ला ने कहा कि पारंपरिक करियर की अवधारणा तेजी से बदल रही है। आज सफलता के लिए लगातार खुद को बदलना और नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना जरूरी है। युवाओं को भावनात्मक रूप से मजबूत रहना होगा। आने वाले समय में उन्हें उद्यमियों की तरह अपने करियर को आगे बढ़ाना होगा, जहां प्रयोग करना, बदलाव स्वीकार करना और असफलताओं से सीखना महत्वपूर्ण होगा।

उन्होंने विद्यार्थियों से अपने करियर को केवल नौकरी तक सीमित नहीं रखने और देश व समाज के विकास में योगदान देने की भावना के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों और उनके परिवारों को बधाई देते हुए कहा कि दीक्षांत समारोह एक यात्रा के अंत और दूसरी यात्रा की शुरुआत का प्रतीक है। इस प्रतिष्ठित संस्थान से उनके परिवार के पुराने और गहरे संबंध रहे हैं। ऐसे में यहां उपस्थित होना उनके लिए सुखद अनुभव है।
62 विद्यार्थियों को 124 मेडल और पुरस्कार
समारोह में उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन करने वाले 62 विद्यार्थियों को 124 मेडल और पुरस्कार प्रदान किए गए। प्रेसिडेंट्स गोल्ड मेडल बीटेक, बीआर्क और इंटीग्रेटेड डुअल डिग्री के विद्यार्थियों में उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए दिया गया। वहीं, दो विद्यार्थियों को डायरेक्टर्स गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। यह सम्मान शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ सर्वांगीण प्रदर्शन, संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व कौशल के आधार पर प्रदान किया जाता है।
बिड़ला परिवार को बीएचयू से रहा है पुराना नाता
कुमार मंगलम बिड़ला को डॉक्टर ऑफ साइंस की मानद उपाधि दिए जाने की घोषणा आईआईटी बीएचयू के निदेशक अमित पात्रा ने की। इस मौके पर बिड़ला परिवार और बीएचयू के पुराने संबंधों का भी उल्लेख हुआ। बीएचयू के पूर्व कार्यविशेष अधिकारी डॉ. विश्वनाथ पांडेय के अनुसार, विश्वविद्यालय ने बिड़ला परिवार की तीन पीढ़ियों को मानद डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित किया है।
12 सितंबर 2004 को बीएचयू के 86वें दीक्षांत समारोह में तत्कालीन कुलपति प्रो. रामचंद्र राव ने कुमार मंगलम बिड़ला को मानद डी.लिट. की उपाधि प्रदान की थी। इससे पहले उनके पुरखे राजा बलदेव दास बिड़ला को 1937 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने डी.लिट. की उपाधि दी थी। वर्ष 1967 में उनके बेटे घनश्याम दास बिड़ला को भी यह सम्मान मिला था।
महामना की परिकल्पना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी युवाओं पर
बीएचयू की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने का सपना देखा था। इसी उद्देश्य से उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, ताकि भारत अपनी परंपराओं के साथ आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में भी दुनिया में पहचान बना सके।
उन्होंने कहा कि महामना की परिकल्पना को आगे बढ़ाते हुए विश्वविद्यालय ने समय के साथ कई उपलब्धियां हासिल की हैं। बैंक की स्थापना से लेकर आज आईआईटी बीएचयू के रूप में देश के अग्रणी तकनीकी संस्थानों में शामिल होना इसकी विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पांडेय ने विश्वास जताया कि दीक्षांत समारोह में उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थी महामना की इस परिकल्पना को आगे बढ़ाएंगे और देश-दुनिया में भारत का नाम रोशन करेंगे। उन्होंने कुमार मंगलम बिड़ला के हाथों सम्मानित हुए सभी विद्यार्थियों को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
