कुशीनगर: करमैनी गांव के युवक का नवाचार, धुआं रहित लकड़ी का उन्नत चूल्हा बना चर्चा का विषय

कुशीनगर: करमैनी गांव के युवक का नवाचार, धुआं रहित लकड़ी का उन्नत चूल्हा बना चर्चा का विषय

(रणभेरी): कुशीनगर जनपद के उजारनाथ क्षेत्र के करमैनी गांव में रहने वाले मार्कंडेय सिंह ने ग्रामीण रसोई की एक बड़ी समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजकर स्थानीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना दिया है। पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों से निकलने वाला धुआं, अधिक ईंधन की खपत और धीमी पाक प्रक्रिया जैसी परेशानियों के बीच उन्होंने एक ऐसा आधुनिक चूल्हा विकसित किया है, जो कम लकड़ी में अधिक ताप उत्पन्न करने के साथ-साथ धुएं को भी काफी हद तक नियंत्रित करता है।

स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए इस चूल्हे का ढांचा स्टील से निर्मित है। इसकी खासियत यह है कि इसमें एक छोटा विद्युत पंखा और 12 वोल्ट की रिचार्जेबल बैटरी लगाई गई है। यह पंखा दहन प्रक्रिया के दौरान लगातार ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है, जिससे लकड़ी पूरी तरह और अधिक कुशलता से जलती है। परिणामस्वरूप धुआं काफी कम निकलता है और आग की क्षमता भी बेहतर हो जाती है।

निर्माता मार्कंडेय सिंह के अनुसार, इस चूल्हे की बैटरी एक बार पूरी तरह चार्ज होने पर लगभग तीन घंटे में तैयार हो जाती है और उपयोग के आधार पर करीब 12 घंटे तक लगातार चल सकती है। उनका दावा है कि एक बार चार्ज करने के बाद यह उपकरण कई घंटों तक बिना रुकावट काम करता है और सामान्य घरेलू उपयोग में लगभग तीन दिन तक प्रभावी बना रह सकता है।

ईंधन दक्षता के मामले में भी यह चूल्हा उल्लेखनीय बताया जा रहा है। मार्कंडेय सिंह का कहना है कि लगभग एक किलोग्राम लकड़ी में दस लोगों तक का भोजन आसानी से तैयार किया जा सकता है, जो पारंपरिक चूल्हों की तुलना में काफी अधिक किफायती है। साथ ही धुएं की कमी के कारण रसोई में काम करने वाली महिलाओं को आंखों में जलन और सांस संबंधी परेशानी से राहत मिल रही है।

इस नवाचार का स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर भी संज्ञान लिया गया है। तमकुहीराज की उपजिलाधिकारी आकांक्षा मिश्रा ने इस चूल्हे का परीक्षण किया और इसकी कार्यप्रणाली को नजदीक से देखा। उन्होंने इस तकनीकी प्रयास की सराहना करते हुए इसे ग्रामीण जरूरतों के अनुरूप उपयोगी नवाचार बताया। बताया जाता है कि उन्होंने स्वयं भी इस चूल्हे को खरीदने में रुचि दिखाई।

लगभग एक हजार रुपये की लागत में तैयार होने वाला यह चूल्हा गैस स्टोव की तरह ही आंच को नियंत्रित करने की सुविधा भी देता है, जिससे उपयोगकर्ता आवश्यकता अनुसार तापमान कम या अधिक कर सकते हैं।

मार्कंडेय सिंह की शैक्षिक पृष्ठभूमि दसवीं कक्षा तक की रही है, लेकिन तकनीक और प्रयोगों के प्रति उनकी रुचि हमेशा बनी रही। आजीविका के सिलसिले में वे मुंबई और दुबई जैसे स्थानों पर भी काम कर चुके हैं। लगभग एक वर्ष पूर्व उन्हें इस प्रकार के चूल्हे का विचार आया, जिसके बाद उन्होंने कई बार प्रयास किए। शुरुआती तीन प्रयास असफल रहे, लेकिन चौथे प्रयास में उन्हें सफलता मिली।

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