वाराणसी (रणभेरी): उत्तर प्रदेश में आज हजरत पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन के चेहलुम (अरबईन) के मौके पर शिया समुदाय श्रद्धा और गम के साथ उन्हें याद कर रहा है। राजधानी लखनऊ समेत जौनपुर, वाराणसी, कानपुर, मेरठ, सुल्तानपुर, अमरोहा, मुरादाबाद, अयोध्या, गोरखपुर और अन्य जिलों में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विभिन्न स्थानों से अलम, ताबूत, ताजिया, दुलदुल और अमारी के जुलूस निकाले जाएंगे, जिनमें बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल होकर जियारत करेंगे।
धार्मिक स्थलों और इमामबाड़ों में सुबह से ही मजलिसों का दौर शुरू हो गया है। जगह-जगह इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए मर्सिया, नौहा और मातम का आयोजन किया जा रहा है। प्रशासन ने भी जुलूसों के निर्धारित मार्गों पर सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए हैं।
कर्बला की शहादत की याद में मनाया जाता है चेहलुम
इस्लामी इतिहास के अनुसार लगभग 1400 वर्ष पहले, 61 हिजरी में इराक के कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। बताया जाता है कि 10 मुहर्रम (आशूरा) के दिन उन्हें और उनके साथियों को तीन दिनों की प्यास और भूख के बाद शहीद कर दिया गया।
इसी घटना की याद में आशूरा के 40वें दिन चेहलुम या अरबईन मनाया जाता है। यह दिन इमाम हुसैन की कुर्बानी, सब्र, इंसाफ और सच्चाई के संदेश को याद करने का अवसर माना जाता है।
धार्मिक विद्वान ने बताया चेहलुम का महत्व
धार्मिक विद्वान मौलाना कैसर हुसैन नजफी के अनुसार, 61 हिजरी में तत्कालीन शासक यजीद की सेना ने 2 मुहर्रम को कर्बला में इमाम हुसैन और उनके परिवार को रोक लिया था। इसके बाद 7 मुहर्रम से उनके लिए पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई और उन्हें नहर-ए-फरात से दूर कर दिया गया।
उन्होंने बताया कि महिलाओं और छोटे-छोटे बच्चों सहित पूरा काफिला कठिन परिस्थितियों में रहा। आखिरकार 10 मुहर्रम को हुए संघर्ष में इमाम हुसैन और उनके 71 साथी शहीद हो गए। शहीदों में छह माह के अली असगर का भी उल्लेख किया जाता है।
शहादत के बाद परिवार को बनाया गया कैदी
मौलाना के अनुसार, कर्बला की घटना के बाद इमाम हुसैन के परिवार की महिलाओं, बच्चों और उनके बीमार पुत्र इमाम सज्जाद को बंदी बना लिया गया। पहले उन्हें कूफा ले जाया गया और उसके बाद शाम (वर्तमान सीरिया) पहुंचाया गया। इस दौरान शहीदों के शव कर्बला में ही पड़े रहे और उनके सिर अलग कर दिए गए थे।
उन्होंने बताया कि कैद के दौरान परिवार को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसी अवधि में इमाम हुसैन की चार वर्षीय पुत्री की भी मृत्यु हो गई। बाद में 20 सफर 61 हिजरी को बंदियों को रिहा किया गया। इसके बाद बीबी जैनब और अन्य परिजन कर्बला लौटे, जहां शहीदों के पार्थिव अवशेषों को दफनाया गया। इसी ऐतिहासिक क्रम की स्मृति में हर वर्ष चेहलुम मनाया जाता है।
वाराणसी में निकलेंगे कई पारंपरिक जुलूस
वाराणसी में चेहलुम के अवसर पर विभिन्न इमामबाड़ों और मस्जिदों से पारंपरिक जुलूस निकाले जाएंगे। वक्फ इमामबाड़ा एवं मस्जिद मीर इमाम अली व मेहंदी बेगम से निकलने वाला लगभग एक सदी पुराना ताजिया जुलूस दालमंडी, नई सड़क, कालीमहल, पितृकुंडा और लल्लापुरा होते हुए दरगाह फातमान पहुंचेगा, जहां इसका समापन होगा।
इसके अलावा कालीमहल, शिवाला, गौरीगंज, अर्दली बाजार, दोषीपुरा, चौहट्टा लाल खां और मुकीमगंज सहित अन्य क्षेत्रों से भी अलग-अलग जुलूस निकाले जाएंगे। इनमें से कुछ गंगा घाट तक जाएंगे, जबकि अन्य निर्धारित इमामबाड़ों और धार्मिक स्थलों पर समाप्त होंगे।
सुरक्षा व्यवस्था कड़ी
चेहलुम के मद्देनजर प्रदेश के संवेदनशील जिलों में पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। जुलूस मार्गों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन के जरिए निगरानी की जा रही है ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें। यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए कई स्थानों पर रूट डायवर्जन भी लागू किए गए हैं।
