वाराणसी (रणभेरी): वाराणसी के पितरकुंडा क्षेत्र स्थित हैदर विला में ईद-ए-गदीर के अवसर पर एक भव्य आयोजन किया गया, जिसमें शिया समुदाय के साथ-साथ अन्य लोगों की भी बड़ी मौजूदगी रही। इस मौके पर स्थानीय और बाहरी शायरों ने हज़रत इमाम अली (अ.स.) की शान में कसीदे और नज़्में पेश कर महफिल को देर रात से सुबह तक गुलजार रखा।
कार्यक्रम की शुरुआत मौलाना अकील हुसैनी के संबोधन से हुई। उन्होंने ईद-ए-गदीर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि यह दिन इस्लामी इतिहास में अत्यंत अहम स्थान रखता है। उन्होंने लोगों से इस पैगाम को समझने और अपने जीवन में अपनाने की अपील की।

इसके बाद शायरों की प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें करीब 20 से अधिक शायरों ने हिस्सा लिया। मेरठ से आए शायर फखरी मेरठी समेत कई शायरों ने अपने कलाम से महफिल में रंग भर दिया। शायर शाद सिवानी के कलाम से कार्यक्रम का आगाज़ हुआ, जिसके बाद रज़ी बिस्वानी, नफीस हल्लौरी सहित अन्य शायरों ने भी अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।
फखरी मेरठी द्वारा पढ़े गए अशआर को श्रोताओं ने खूब सराहा और जोरदार दाद दी। वहीं जैन बनारसी के तरन्नुमी कलाम को भी लोगों ने काफी पसंद किया, जिसमें उन्होंने हज़रत अली के ज़िक्र से मिलने वाले हौसले और प्रेरणा को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
मौलाना सैयद अकील हुसैनी ने गदीर-ए-खुम की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि हज से वापसी के दौरान पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब ने यह महत्वपूर्ण घोषणा की थी “जिसका मैं मौला, उसका अली मौला।” उन्होंने कहा कि यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है। कार्यक्रम देर रात तक शायरी, कसीदों और नातिया कलामों के साथ चलता रहा, जिसमें उपस्थित लोगों ने इसे एक आध्यात्मिक और भावनात्मक अनुभव बताया।
