स्क्रीन पर बनते रिश्ते, भरोसे की कसौटी पर टूटते सपने

स्क्रीन पर बनते रिश्ते, भरोसे की कसौटी पर टूटते सपने
  • मैट्रिमोनियल ऐप्स ने आसान की जीवनसाथी की तलाश, लेकिन बढ़े फर्जी प्रोफाइल और धोखाधड़ी के मामले
  • शादी के बाद दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना जैसी घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
  • विशेषज्ञ बोले – ऑनलाइन रिश्ता तय करने से पहले परिवार, नौकरी और सामाजिक पृष्ठभूमि की जांच जरूरी

वाराणसी (रणभेरी): डिजिटल दौर ने जिंदगी के लगभग हर क्षेत्र को बदल दिया है और अब रिश्तों की दुनिया भी इससे अछूती नहीं रही। एक समय था जब शादी-विवाह के रिश्ते परिवार, रिश्तेदार और सामाजिक भरोसे के आधार पर तय होते थे। खानदान, व्यवहार, संस्कार और सामाजिक पहचान को प्राथमिकता दी जाती थी। लेकिन बदलते समय में अब रिश्ते मोबाइल स्क्रीन और इंटरनेट प्लेटफॉर्म तक सिमटते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी ही नहीं, परिवार भी अब शादी के लिए ऑनलाइन मैट्रिमोनियल ऐप्स का सहारा लेने लगे हैं।

शादी.कॉम, जीवनसाथी, भारत मैट्रिमोनी जैसे प्लेटफॉर्म ने जीवनसाथी तलाशने की प्रक्रिया को तेज और आसान जरूर बनाया है। दूर-दराज के शहरों और राज्यों के लोगों को जोड़ने में इन ऐप्स की बड़ी भूमिका रही है। व्यस्त जीवनशैली और सीमित सामाजिक दायरे के बीच यह माध्यम लोगों के लिए सुविधाजनक साबित हो रहा है। लेकिन इन सुविधाओं के साथ कई गंभीर खतरे और विवाद भी तेजी से सामने आ रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन रिश्तों से जुड़े धोखाधड़ी, फर्जी पहचान, आर्थिक शोषण, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के मामले बढ़े हैं। कई घटनाओं में शादी के बाद यह पता चला कि सामने वाले ने अपनी नौकरी, आय, वैवाहिक स्थिति या पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर गलत जानकारी दी थी। कहीं शादी के नाम पर लाखों रुपये की ठगी हुई तो कहीं रिश्ते टूटने के बाद कानूनी विवाद और मानसिक तनाव ने दोनों परिवारों की जिंदगी प्रभावित कर दी।

कुछ मामलों में महिलाओं ने दहेज प्रताड़ना और हिंसा के आरोप लगाए, वहीं कई पुरुषों ने भी झूठे मुकदमों और मानसिक उत्पीड़न की शिकायत की। ऐसे मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बनने वाले रिश्तों में भरोसे की नींव कमजोर होती जा रही है।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि पहले रिश्ते सामाजिक जिम्मेदारी और पारिवारिक निगरानी में तय होते थे, इसलिए उनमें स्थिरता अधिक होती थी। अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोग अपनी प्रोफाइल को आकर्षक बनाने के लिए कई बार वास्तविकता छिपा देते हैं। फोटो एडिटिंग, बनावटी लाइफस्टाइल और बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई जानकारी लोगों को प्रभावित तो करती है, लेकिन शादी के बाद सच्चाई सामने आने पर विवाद शुरू हो जाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मैट्रिमोनियल ऐप्स पूरी तरह गलत नहीं हैं, लेकिन आंख बंद करके भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। केवल प्रोफाइल और ऑनलाइन बातचीत के आधार पर रिश्ता तय करना जल्दबाजी साबित हो सकता है। परिवारों को चाहिए कि वे सामने वाले व्यक्ति की नौकरी, सामाजिक पृष्ठभूमि, व्यवहार और पारिवारिक स्थिति की पूरी जांच-पड़ताल करें। आज प्रेम विवाह और ऑनलाइन रिश्तों में बढ़ती अपेक्षाएं, सोशल मीडिया का प्रभाव, करियर का दबाव और आपसी समझ की कमी भी रिश्तों को कमजोर बना रही है। कई युवाओं का मानना है कि अब रिश्ते निभाने से ज्यादा दिखावे और सुविधा पर आधारित होते जा रहे हैं।

सामाजिक जानकारों के अनुसार डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल एक माध्यम हो सकते हैं, लेकिन रिश्ते आज भी विश्वास, समझदारी और पारिवारिक मूल्यों पर ही टिके रहते हैं। मोबाइल ऐप किसी व्यक्ति के संस्कार, व्यवहार और नीयत की गारंटी नहीं दे सकते। यही वजह है कि आज के दौर में रिश्तों की दुनिया में भरोसा सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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