काशी में वट सावित्री व्रत की धूम: सुहागिनों ने बरगद पूजन कर मांगा अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र के लिए रखा निर्जला व्रत

काशी में वट सावित्री व्रत की धूम: सुहागिनों ने बरगद पूजन कर मांगा अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र के लिए रखा निर्जला व्रत

वाराणसी (रणभेरी): अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा पावन पर्व वट सावित्री व्रत शनिवार को धर्मनगरी काशी सहित देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से ही मंदिरों, घाटों और वट वृक्षों के आसपास महिलाओं की भारी भीड़ देखने को मिली। सुहागिन महिलाएं पारंपरिक परिधानों और श्रृंगार में सजकर पूजा-अर्चना के लिए पहुंचीं। पूजा स्थलों पर मंत्रोच्चार, भजन और धार्मिक गीतों से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

महिलाओं ने बरगद के वृक्ष की विधिवत पूजा कर परिवार की खुशहाली, पति के उत्तम स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की मंगल कामना की। व्रत करने वाली महिलाओं ने वट वृक्ष के चारों ओर कच्चे सूत का धागा बांधते हुए परिक्रमा की और दीप प्रज्वलित कर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी।

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सुबह से मंदिरों और वट वृक्षों पर लगी रही भीड़

काशी में शनिवार की सुबह से ही विभिन्न मोहल्लों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर स्थित वट वृक्षों के नीचे महिलाओं का जमावड़ा शुरू हो गया था। महिलाएं पूजा की थाली में फल, फूल, सिंदूर, रोली, अक्षत, श्रृंगार सामग्री और मिठाइयां लेकर पहुंचीं। कई स्थानों पर सामूहिक रूप से कथा श्रवण और भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया गया।

पूजा के दौरान महिलाओं ने वट वृक्ष की 7, 11, 51 और 108 बार परिक्रमा की। धार्मिक मान्यता के अनुसार बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास माना जाता है। इसलिए इसकी पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

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पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है व्रत

व्रत करने आई श्रद्धालु महिलाओं ने बताया कि वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से पति की आयु लंबी होती है और परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं।

श्रद्धालु महिलाओं ने कहा कि यह व्रत केवल परंपरा नहीं बल्कि पति-पत्नी के अटूट विश्वास, समर्पण और प्रेम का प्रतीक भी है। महिलाओं ने देशभर की बहनों और बेटियों के सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए सभी को वट सावित्री व्रत की शुभकामनाएं दीं।

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सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ी है परंपरा

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार वट सावित्री व्रत की परंपरा माता सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने वर्षों तक कठोर तप और यज्ञ किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या होने का वरदान दिया। देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण कन्या का नाम सावित्री रखा गया।

युवावस्था में सावित्री ने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। देवर्षि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के कुछ वर्षों बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। इसके बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह किया।

पतिव्रता धर्म से जीते यमराज

समय बीतने के साथ वह दिन भी आ गया जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। उस समय सावित्री ने कठोर व्रत और तपस्या आरंभ कर दी। जब यमराज सत्यवान के प्राण हरकर ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

सावित्री की निष्ठा, समर्पण और धर्मपालन से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने सास-ससुर की नेत्र ज्योति और दीर्घायु मांगी। दूसरे वरदान में उन्होंने अपने पति का खोया हुआ राज्य वापस मांगा। अंत में सावित्री ने सौ पुत्रों का आशीर्वाद मांगा। यमराज ने वरदान देते समय यह स्वीकार किया कि बिना पति के यह संभव नहीं है, जिसके बाद उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए। तभी से यह व्रत सुहागिन महिलाओं के बीच अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

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परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम

वट सावित्री व्रत के अवसर पर काशी में आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। मंदिरों और पूजा स्थलों पर महिलाओं ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की। दिनभर धार्मिक आयोजनों और कथा-पूजन का सिलसिला चलता रहा, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंगा नजर आया।

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