वाराणसी (रणभेरी): दालमंडी क्षेत्र में प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई के बीच अब बिजली विभाग की बकाया वसूली को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। क्षेत्र में चौड़ीकरण के लिए अब तक बड़ी संख्या में मकानों और दुकानों को हटाया जा चुका है। इसी बीच बिजली विभाग ने दालमंडी क्षेत्र के बकायेदार उपभोक्ताओं और बिजली चोरी के मामलों में जुर्माना लगाने वालों से करीब 6.17 करोड़ रुपये की वसूली का दावा किया है।
बिजली विभाग के मुताबिक क्षेत्र में 554 उपभोक्ताओं पर करीब 5.79 करोड़ रुपये का बकाया है, जबकि 29 मामलों में बिजली चोरी से संबंधित करीब 39 लाख रुपये की धनराशि वसूल की जानी है। विभाग का कहना है कि संबंधित लोगों को पहले ही बकाया जमा करने के लिए नोटिस दिए जा चुके हैं।
हालांकि, बिजली विभाग की इस कार्रवाई की जानकारी सामने आने के बाद दालमंडी के प्रभावित लोगों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब चौड़ीकरण के लिए मकानों और दुकानों का अधिग्रहण किया गया और मुआवजा वितरित किया गया, उस समय विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारी मौके पर मौजूद थे। ऐसे में यदि बिजली विभाग अथवा नगर निगम का कोई पुराना बकाया था तो मुआवजा जारी करने से पहले उसका निस्तारण क्यों नहीं किया गया?
179 मकान हटाए गए, अब सामने आया बिजली का बकाया
दालमंडी चौड़ीकरण परियोजना के तहत अब तक करीब 179 मकानों को ध्वस्त किया जा चुका है। वहीं क्षेत्र की कुछ धार्मिक संरचनाओं को हटाने की प्रक्रिया भी चल रही है। प्रभावित लोगों के मुताबिक चौड़ीकरण के लिए जिन भवनों को हटाया गया, उनके मालिकों को सरकारी प्रक्रिया के तहत मुआवजा दिया गया।
स्थानीय लोगों का तर्क है कि मुआवजा देने से पहले संबंधित संपत्तियों से जुड़े विभिन्न विभागों के बकाये और अन्य देनदारियों की जांच की जानी चाहिए थी। यदि बिजली का इतना बड़ा बकाया पहले से मौजूद था तो उस समय उसकी जानकारी संबंधित भवन स्वामियों को देकर मुआवजे से रकम समायोजित की जा सकती थी। अब मकान और दुकानें हटाए जाने के बाद बिजली विभाग की ओर से वसूली की बात सामने आने से प्रभावित लोगों में नाराजगी है।

बिजली विभाग: 554 बकायेदारों से 5.79 करोड़ की वसूली
बिजली विभाग के एक्सईएन कुमार सौरभ के अनुसार दालमंडी क्षेत्र में बकाया रखने वाले उपभोक्ताओं को पूर्व में नोटिस जारी किए जा चुके हैं। विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 554 बकायेदारों पर कुल 5 करोड़ 79 लाख रुपये की राशि बाकी है।
इसके अतिरिक्त 29 बिजली चोरी के मामलों में करीब 39 लाख रुपये की वसूली की जानी है। विभाग अब इन मामलों में नियमानुसार कार्रवाई करते हुए बकाया और जुर्माने की रकम वसूलने की तैयारी में है। बिजली विभाग का कहना है कि बकाया कोई नई जानकारी नहीं है और संबंधित उपभोक्ताओं को पहले ही इसकी सूचना दी जा चुकी थी।
स्थानीय लोगों का सवाल- मुआवजा देने से पहले क्यों नहीं हुई जांच?
दालमंडी के लोगों का कहना है कि विवाद की असली वजह बिजली विभाग की वसूली से ज्यादा सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी है।
स्थानीय निवासी मोहम्मद यासीन उर्फ गुड्डू का कहना है कि प्रभावित लोगों को उम्मीद थी कि संपत्ति का मुआवजा जारी करने से पहले बिजली विभाग, नगर निगम अथवा अन्य सरकारी विभागों के बकाये की जानकारी जुटाई जाएगी। यदि किसी संपत्ति पर रकम बाकी है तो उसे मुआवजे की राशि से काटकर संबंधित विभाग को दे दिया जाएगा।

उनके मुताबिक प्रभावित लोगों को यही जानकारी थी कि मुआवजा जारी करते समय विभिन्न विभागों की देनदारी का समायोजन किया जाएगा। उनका आरोप है कि ऐसा नहीं हुआ और पूरी मुआवजा राशि लोगों को दे दी गई।
यासीन का कहना है कि यदि सरकारी प्रक्रिया में कहीं चूक हुई है तो उसका भार अब उन लोगों पर नहीं डाला जाना चाहिए जिनकी संपत्तियां चौड़ीकरण के लिए हटाई जा चुकी हैं। उनका कहना है कि विभाग आपस में समन्वय कर बकाये का समाधान कर सकते हैं।

‘मुआवजा देने से पहले NOC की जांच किसकी जिम्मेदारी थी?’
यासीन ने सवाल उठाया कि किसी मकान अथवा दुकान से जुड़ी संपत्ति को सरकारी परियोजना के लिए लेने से पहले दस्तावेजों की जांच और आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी NOC की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
उनका कहना है कि यदि मुआवजा देने के बाद भी किसी संपत्ति पर बिजली या नगर निगम का बकाया निकल रहा है तो यह सरकारी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है। उनका दावा है कि चौड़ीकरण के दौरान विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी मौके पर बने कैंप में मौजूद रहते थे। ऐसे में उनका सवाल है कि उस समय संबंधित संपत्तियों का बकाया क्यों नहीं चिन्हित किया गया?
‘बिल जमा है तो बिजली भी मिले’
दालमंडी निवासी अश्वनी कुमार सिंह ने दावा किया कि उनके मकान पर बिजली विभाग का कोई बकाया नहीं है। उनके मुताबिक क्षेत्र के लोगों को बकाये से संबंधित कोई स्पष्ट नोटिस भी नहीं मिला है। उन्होंने क्षेत्र की बिजली व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी जताई। उनका कहना है कि चौड़ीकरण की कार्रवाई के बीच लंबे समय से क्षेत्र में बिजली आपूर्ति प्रभावित है। मीटर लगे होने के बावजूद बिजली उपलब्ध नहीं है और विद्युत लाइन से जुड़े तार भी हटा दिए गए हैं।
अश्वनी के अनुसार बिजली विभाग से समस्या दूर करने की मांग की गई, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि विभाग करोड़ों रुपये के बकाये की वसूली की बात कर रहा है तो जिन उपभोक्ताओं ने अपना बिल समय पर जमा किया है, उन्हें नियमित बिजली आपूर्ति उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी विभाग की है।
‘जब चौक में कैंप लगा था, तब बिजली विभाग क्यों नहीं आया?’
दालमंडी के एक अन्य प्रभावित आदिल खान ने भी बिजली विभाग की कार्रवाई के समय पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चौड़ीकरण की प्रक्रिया के दौरान चौक थाने के कैंप में विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहते थे। उस समय संपत्तियों से संबंधित दस्तावेज और अन्य प्रक्रियाएं पूरी की जा रही थीं। ऐसे में यदि बिजली विभाग के रिकॉर्ड में करोड़ों रुपये का बकाया था तो उसी समय संबंधित लोगों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
आदिल का कहना है कि परियोजना के लिए बड़ी धनराशि स्वीकृत हुई और प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया गया। यदि मुआवजे से बिजली या अन्य सरकारी बकाये की रकम काटी जानी थी तो ऐसा उसी समय किया जाना चाहिए था। उनका आरोप है कि पहले मुआवजा मिलने के बाद अब लोगों को बकायेदार बताया जा रहा है, जिससे प्रभावित परिवारों के सामने नई परेशानी खड़ी हो गई है।
‘सरकार संपत्ति खरीदती है तो कागजों की जांच होती है’
आदिल खान ने संपत्ति अधिग्रहण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि सामान्य तौर पर किसी संपत्ति की खरीद-फरोख्त से पहले उसके दस्तावेज, देनदारियां और संबंधित विभागों की स्थिति जांची जाती है।
उनका सवाल है कि जब सरकारी परियोजना के लिए संपत्तियां ली जा रही थीं तो बिजली विभाग और अन्य विभागों से बकाये की स्थिति की जानकारी क्यों नहीं ली गई? उन्होंने कहा कि यदि बिजली विभाग के रिकॉर्ड में पहले से बकाया दर्ज था और मुआवजा भी सरकारी स्तर से जारी कर दिया गया तो इसके लिए प्रभावित लोगों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
दुकानदारों को लेकर भी उठे सवाल
स्थानीय लोगों ने दुकानदारों से वसूली के मुद्दे पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चौड़ीकरण के दौरान मुआवजा तय करने और वितरित करने की प्रक्रिया में दुकानदारों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए थी।
आदिल खान के मुताबिक जब मुआवजा देने की प्रक्रिया चल रही थी तब यदि दुकानदारों पर बिजली का बकाया था तो उसी समय संबंधित लोगों को सूचीबद्ध किया जाना चाहिए था। अब संपत्तियां हटाए जाने के बाद दुकानदारों से बकाया वसूलने की बात सामने आ रही है। उनका कहना है कि प्रभावित लोगों के पास अब पहले जैसी संपत्ति भी नहीं है और कई लोग दूसरी जगह जा चुके हैं। ऐसे में वर्षों पुराने बकाये की वसूली की प्रक्रिया को लेकर विभागों के बीच स्पष्टता जरूरी है।
पीडब्ल्यूडी और बिजली विभाग के बीच समन्वय का मुद्दा
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अब लोक निर्माण विभाग (PWD) और बिजली विभाग के बीच समन्वय को लेकर खड़ा हो गया है। दालमंडी के प्रभावित लोगों का कहना है कि यदि मुआवजा देने से पहले विभिन्न विभागों के बकाये का सत्यापन किया गया था, तो अब बिजली विभाग की ओर से करोड़ों रुपये की वसूली की स्थिति क्यों बनी?
वहीं उनका यह भी कहना है कि यदि बकाये की जानकारी मुआवजा वितरण के समय उपलब्ध नहीं थी, तो सरकारी प्रक्रिया में हुई चूक का खामियाजा प्रभावित लोगों को नहीं भुगतना चाहिए। स्थानीय लोगों का सुझाव है कि दोनों विभाग आपस में रिकॉर्ड का मिलान कर यह तय करें कि किस संपत्ति पर वास्तविक रूप से कितना बकाया था और मुआवजा जारी करते समय उसकी क्या स्थिति थी।
