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Thursday, March 24, 2016
‘इंकलाब जिंदाबाद साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’-सरदार भगत सिंह


      ‘‘भाभी! आजाद भारत का एक सुनहरा सपना मेरे दिलदिमाग पर छाया रहता है। कितना अच्छा होगा वह दिन जब अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में हमारे देशवासी भी अपना सिर ऊँचा करके चल सकेंगे । अपना राज होगा, अपना संविधान होगा और अपनी संप्रभुता होगी, ब्रिटिश सरकार का कोई जोर जुल्म नहीं होगा। हम उनके समकक्ष हो बात करेंगे, ‘गुलाम’ शब्द तक अपने देश के साथ नहीं जुड़ा रहेगा। भारत की भावी पीढ़ी के हाथ देश की बागडोर होगी, वे एक समाजवादी राष्ट्र की संरचना में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। जहाँ सबको रोजी-रोटी मिलेगी, न कोई ऊँचा होगा न कोई नीचा। कानून की नजर में सब बराबर होंगे।,

      हां, यह सच है कि यह सुनहरा दिन मैं अपनी आंखों से नहीं देख सवूंâगा। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की भूमिका आ़जादी के बाद कम न होगी। सत्ता में आए स्वार्थी व निरंकुश लोगों पर एसोसिएशन कड़ी नजर रखेगा।

      भाभी, आप अपने को अकेली अवश्य महसूस करती होंगी पर अपने मिशन के साथ आप लोगों के बीच जाएंगी तो आप देखेंगी की आपके साथ हजारों हजार लोग हैं। आप बराबर सर्वहारा के लिए समर्पित रहेंगी क्योंकि समाज में शोषण के सबसे ज्यादा शिकार वे ही होते हैं।

      भाभी! मेरे देशवासियों ने मुझे बेहद प्यार दिया है। उनसे बात करने का कितना जी चाहता है। बस इस समय इतना ही कहूँगा- ‘‘ऐ वतन वालों अपने वतन को प्यार करो। उसके लिए अपने दिल में दर्द पैदा करो।’’

      यह हृदय स्पर्शी मार्मिक उद्गार भारत की क्रान्तिकारी भूमि पर पंजाब माता श्रीमती विद्यावती देवी की कोंख से जन्म लेने वाले वीर बालक भगत सिंह ने अपनी फांसी के एक दिन पूर्व २२ मार्च १९३१ को लाहौर के सेन्ट्रल जेल से अपने क्रांतिकारी साथी श्री भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी को लिखे अपने अन्तिम पत्र में व्यक्त किया था। मुल्क की आवाम और मातृ-भूमि से बेइंतहा मोहब्बत करने वाला वह जाबाज क्रान्तिकारी देशभक्त आज हमारे बीच नहीं है। ब्रिटिश हुवूâमत के विरुद्ध हुए भारत के क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास के पन्नों को पीछे पलटकर देखने पर एक ऐसी व्रूâर रक्त रंजित पृष्ठ की धूंधली छवि दिखाई देती है जिसकी कल्पना मात्र से ही रूह कांप उठती है, ऐसा महसूस होता है कि निश्चित रूप से २३ मार्च १९३१ की शाम ७ बजकर ३३ मिनट पर लाहौर के सेन्ट्रल जेल की उन पथरीली और बेगानी दिवारों ने भी खून के आंसू रोये होंगे। जब मां भारती के तीन वीर सपूतों (भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु) ने भारत की आजादी के सपने के साथ बुलन्द आवाज में ‘इन्कलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ का नारा लगाते हुए मुस्कुराकर फांसी के फन्दे को चूमा और फिर गले लगा लिया।

      उस रात जेल की १४ नम्बर बैरक की दीवारों ने भी अंधेरे में फुट - फुट कर रोया होगा जिसमें एक महान क्रांतिकारी ने बैठकर अंतिम बार लेनिन के जीवन चरित्र का अध्ययन किया था।

      इतना ही नहीं एक ओर जहाँ फांसी देते वक्त जल्लाद की आंखे डबडबा गयी, वहीं सेन्ट्रल जेल के चीफ वार्डन, रिटायर्ड फौजी सरदार चतर सिंह ने भी फांसी के कुछ देर बाद फांसी स्थल पर जाकर फुट – फूटकर रोते हुए कहा कि ३० वर्षों की नौकरी में बहुतों को फांसी लगाये जाते देखा है लेकिन इस तरह हौसले से हंसते हुए फांसी चढ़ते हुए इन तीनों के जैसे कभी किसी को नहीं देखा।

      नजरें शर्मसार होती है सोचकर कि सच्चे देशभक्त क्रांतिकारियों के जनाजे को किसी का कांधा भी नसीब न हुआ। बल्कि उनके इस पवित्र शरीर को ब्रिटिश हुवूâमत के दरिंदों ने टुकड़े-टुकड़े में काटकर बोरी में भरा और फिर फिरोजपुर के पास सतलज नदी के किनारे ले जाकर मिट्टी का तेल डालकर जला दिया तथा अधजली स्थिति में उनके शरीर के टुकड़ों को पानी में पेंâक दिया। जनता को उस स्थान पर खून से सने पत्थर और सतलज नदी के किनारे लाल हो चुके पानी में तैरते हुए लाशों के टुकड़ों के सिवाय कुछ नहीं मिला। भगत सिंह ने अपने सम्पूर्ण जीवन को देश के लिए समर्पित कर दिया।

      साम्राज्यवाद के प्रबल विरोधी होने के साथ-साथ भगत सिंह में एक कुशल लेखक, पत्रकार,

      साहित्यकार, कवि, शिक्षक एवं क्रांतिकारी के गुण विद्यमान रहे। अफसोस इस बात का है कि जिस भगत सिंह के संघर्ष की गाथा स्वर्ण अक्षरों में लिखी जानी चाहिए थी, जिनके बलिदान ने ब्रिटिश हुकुमत को झकझोर कर रख दिया था, जिनकी जिन्दादिली ने युवाओं को देशप्रेम कर पाठ पढ़ाया, उन्हीं महान क्रान्तिकारियों की कुर्बानी को आजाद भारत में नजर अंदाज किया गया। उनकी स्मृति को संजोने के बजाय नष्ट किया गया। यहाँ तक कि उन्हें देश के सामने आतंकवादी प्रस्तुत करने का घिनौना प्रयास भी किया गया।

     भगत सिंह के विचारों का निष्पक्ष एवं पारखी नजरों से अध्ययन किया जाए तो यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि महानतम क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह अपने युग के सर्वोच्च मानवतावादी एवं सही अर्थों में समाजवादी इंसान थे। उनकी समतावादी सोच में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता एवं संदिग्धता नहीं थी। उन्होंने भारत के शोषित, उत्पीड़ित और सर्वहारा वर्ग के कल्याण के लिए जो समाजवादी स्वप्न देखा था यदि भारत ने उसका अनुशीलन किया होता तो यह देश चीन की भाँति सम्पन्न, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर कर आता। भगत सिंह श्रमिकों, मजदूरों, शोषितों, दलितों और भूखे नंगों के हितैषी थे। यदि वे जीवित होते और सत्ता में आते तो भारत में साम्यवादी शासन प्रणाली की स्थापना हो जाती और भारत का विभाजन कभी नहीं होता।

      विचारों की शान पर इंकलाब की तलवार को धार देने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह को अपना आदर्श मानकर देश के युवाओं को उनके साम्राज्यवाद विहीन भारत निर्माण के विचारों को प्रचारित व प्रसारित करने हेतु आगे आने की जरूरत है। सरदार भगत सिंह ने केवल भारत ही नहीं बल्कि भारत के लोगों की आजादी के लिए आन्दोलन चलाया था। भगत सिंह का वह आन्दोलन आज भी अधूरा है। १५ अगस्त १९४७ की तारिख को भारत आजाद हुआ, लेकिन इस देश का आखिरी आदमी आज भी गुलामों से बद्तर जिन्दगी जी रहा है। आजादी के दिवाने नौजवान सरदार भगत सिंह के विचारों का अनुसरण ही साम्राज्यवाद विहीन भारत का निर्माण कर सकता है। और भगत सिंह के सपने के भारत का निर्माण ही उन्हें हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके सपनों के भारत निर्माण हेतु यदि देश के नौजवान आगे आये तो निश्चित रूप से युग परिवर्तन की क्रांति का पुर्नजन्म होगा और भारत में साम्राज्यवादी व्यवस्था का अन्त होगा।