बदलते रंगों के साथ विदेश तक पहुंची बनारसी कला

बदलते रंगों के साथ विदेश तक पहुंची बनारसी कला
  • राखी में सजी गुलाबी मीनाकारी, चांदी की पट्टी पर हाथों से उकेरे जा रहे बारीक डिजाइन
  • राखी के बाद ब्रेसलेट-चोकर के रूप में भी इस्तेमाल, नीले-पीले रंगों का मेल, 500 से 2000 रुपये तक है कीमत
  • छठी पीढ़ी के कारीगर रोहन विश्वकर्मा ने संभाली विरासत, मॉरीशस, अमेरिका और कनाडा तक पहुंची राखियां

वाराणसी (रणभेरी): रक्षाबंधन से पहले बनारस की गलियां रंग-बिरंगी राखियों से गुलजार हैं। बाजार में भले ही तरह-तरह की राखियां आकर्षण का केंद्र हों, लेकिन कारीगरों की कार्यशालाओं में तैयार हो रही चांदी और गुलाबी मीनाकारी की राखियां अपनी अलग पहचान बना रही हैं। खास बात यह है कि इस बार पारंपरिक गुलाबी रंग के साथ नीले और पीले रंग का प्रयोग भी किया गया है। वहीं राखी को त्योहार के बाद भी इस्तेमाल करने लायक बनाया गया है। कुछ डिजाइन खोलने के बाद ब्रेसलेट, चोकर या दूसरी ज्वेलरी के रूप में पहने जा सकते हैं।

बनारस के कारीगर रोहन विश्वकर्मा की कार्यशाला में इस बार करीब 40 डिजाइन की राखियां तैयार की गई हैं। इनमें पारंपरिक डिजाइन के साथ युवाओं की पसंद के अनुरूप नए पैटर्न और रंग शामिल हैं। रोहन के मुताबिक, देश के विभिन्न शहरों के साथ विदेशों से भी राखियों के ऑर्डर मिले हैं। मॉरीशस, अमेरिका और कनाडा तक इन राखियों की खेप भेजी गई है।

बदलते रंगों के साथ विदेश तक पहुंची बनारसी कला

राखी खुलने के बाद बनेगी ब्रेसलेट

कार्यशाला में कारीगर चांदी की पट्टी पर बारीक डिजाइन उकेरने के बाद उसमें मीना भरते नजर आते हैं। एक-एक डिजाइन तैयार करने में काफी समय और मेहनत लगती है। इसी वजह से कुछ राखियों को इस तरह तैयार किया गया है कि रक्षाबंधन के बाद भी उनका इस्तेमाल जारी रहे। कुछ राखियां ब्रेसलेट तो कुछ चोकर और अन्य आभूषणों का रूप ले सकती हैं।

रोहन बताते हैं कि ग्राहकों की पसंद तेजी से बदल रही है। लोग अब ऐसी चीजें खरीदना चाहते हैं, जिनका उपयोग त्योहार के बाद भी किया जा सके। इसी सोच के साथ इन राखियों को तैयार किया गया है।

गुलाबी मीनाकारी में नीला-पीला रंग

बनारस की गुलाबी मीनाकारी अपनी पारंपरिक गुलाबी रंगत के लिए मशहूर है। इस बार कारीगरों ने गुलाबी के साथ नीले और पीले रंग का मेल कर नए प्रयोग किए हैं। पारंपरिक रंग की मांग अब भी कायम है, लेकिन युवा ग्राहक नए रंगों और डिजाइन को अधिक पसंद कर रहे हैं।

बदलते रंगों के साथ विदेश तक पहुंची बनारसी कला

मशीन नहीं, हाथों से तैयार होती है राखी

इन राखियों की खासियत उनका डिजाइन ही नहीं, बल्कि इन्हें तैयार करने की पूरी प्रक्रिया भी है। चांदी की पट्टी बनाने से लेकर डिजाइन उकेरने, मीना भरने और रंगों को अंतिम रूप देने तक का काम हाथों से किया जाता है। पारंपरिक औजारों से होने वाली इस कारीगरी में मामूली चूक भी पूरा डिजाइन खराब कर सकती है। एक छोटी राखी तैयार करने में भी कारीगर को धैर्य और एकाग्रता के साथ काम करना पड़ता है। इन राखियों की कीमत करीब 500 से 2000 रुपये तक है। डिजाइन, चांदी और बारीक कारीगरी के आधार पर कीमत तय होती है। हाथ से निर्माण होने के कारण उत्पादन सीमित रहता है।

बचपन में सीखा हुनर, छठी पीढ़ी में पहुंची कला

रोहन विश्वकर्मा के लिए मीनाकारी सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि परिवार की विरासत है। वह इस कला को आगे बढ़ाने वाली छठी पीढ़ी हैं। करीब नौ-दस साल की उम्र में उन्होंने पिता रमेश कुमार विश्वकर्मा को काम करते देखकर यह हुनर सीखना शुरू किया। उनके पिता राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कारीगर हैं। रोहन के अनुसार, बचपन में खेलते-खेलते औजार पकड़ना शुरू किया और धीरे-धीरे डिजाइन बनाना, मीना भरना और रंगों को सही ढंग से बैठाना सीखा।

बदलते रंगों के साथ विदेश तक पहुंची बनारसी कला

नकली मीनाकारी से चुनौती, अब विदेश तक पहचान

रोहन बताते हैं कि एक समय मीनाकारी का काम घर और आसपास के बाजार तक सीमित था। मशीन से बने उत्पाद और नकली डिजाइन बाजार में आने से पारंपरिक कारीगरों के सामने चुनौती बढ़ी। हालांकि, समय के साथ गुलाबी मीनाकारी ने अपनी अलग पहचान बनाई। अब देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों से भी ऑर्डर मिल रहे हैं।

चमकदार राखी के पीछे कारीगरों का दर्द

राखियों की चमक के पीछे कारीगरों की कड़ी मेहनत भी छिपी है। घंटों एक ही मुद्रा में बैठकर बारीक डिजाइन तैयार करने से गर्दन और कमर में दर्द होता है। लगातार सूक्ष्म काम करने से आंखों पर भी जोर पड़ता है। कारीगर भरत बताते हैं कि काम के दौरान लगातार नीचे झुकना पड़ता है। कई घंटे इसी स्थिति में काम करने के बावजूद डिजाइन पूरा करने के लिए मेहनत जारी रखनी पड़ती है।

सबसे बड़ी चिंता- अगली पीढ़ी कौन संभालेगा?

मांग बढ़ने के बावजूद कारीगरों की सबसे बड़ी चिंता इस कला का भविष्य है। पहले परिवार के बच्चे कम उम्र से ही माता-पिता के साथ बैठकर यह हुनर सीखते थे, लेकिन अब युवा इसे करियर के रूप में अपनाने से बच रहे हैं। कॉलेज छात्र और महिलाएं प्रशिक्षण के लिए पहुंच रहे हैं, लेकिन कुछ दिनों में यह कला पूरी तरह सीखना संभव नहीं। इसके लिए वर्षों का अभ्यास और धैर्य चाहिए।
बनारस की गुलाबी मीनाकारी अब राखियों के जरिए देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंच रही है। रंग और डिजाइन भले बदल रहे हों, लेकिन चांदी पर सजी इन राखियों में पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर आज भी कारीगरों के हाथों से ही आकार ले रहा है।

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