वाराणसी (रणभेरी): ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी विवाद में सुप्रीम कोर्ट की ओर से मध्यस्थता की पहल के बाद मामले में एक नया घटनाक्रम सामने आया है। न्यायालय के निर्देश के बाद सभी संबंधित पक्षों को 14 जुलाई को वाराणसी सिविल कोर्ट में उपस्थित होकर मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने के लिए नोटिस जारी किया गया है। हालांकि, इस पहल को लेकर विवाद से जुड़े दोनों प्रमुख पक्षों की अलग-अलग राय सामने आई है।
मुस्लिम पक्ष की ओर से ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली संस्था अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार कर दिया है। कमेटी की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का मध्यस्थता संबंधी सुझाव अनिवार्य नहीं है। कमेटी ने इस मामले में मध्यस्थता के बजाय न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से समाधान की बात कही है।
कमेटी के पदाधिकारियों का कहना है कि विवाद से जुड़े सभी पहलुओं पर अदालत में सुनवाई चल रही है और वे उसी प्रक्रिया पर भरोसा रखते हैं। इसी वजह से कमेटी ने मध्यस्थता बैठक में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया है।

दूसरी ओर, हिंदू पक्ष की वादिनी लक्ष्मी देवी ने भी मध्यस्थता के प्रस्ताव पर सहमति नहीं जताई है। उनका कहना है कि उनका पक्ष किसी समझौते के लिए नहीं, बल्कि पूरे ज्ञानवापी परिसर से जुड़े धार्मिक दावे को लेकर अदालत में गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस मामले में न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार करेंगी।
हिंदू पक्ष का कहना है कि यह मामला लंबे समय से अदालत में विचाराधीन है और इसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए। पक्षकारों का मानना है कि अदालत के फैसले से ही विवाद का स्थायी समाधान निकल सकता है।
गौरतलब है कि ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी मामला वर्ष 2022 से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले में अलग-अलग पक्षों की ओर से अपने दावे और आपत्तियां रखी गई हैं। अब मध्यस्थता की पहल के बाद सभी की नजरें आगे की कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं।
फिलहाल, दोनों प्रमुख पक्षों द्वारा मध्यस्थता से दूरी बनाए जाने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे अदालत इस मामले में क्या दिशा तय करती है और विवाद के समाधान के लिए कौन-सा रास्ता अपनाया जाता है।
