वाराणसी (रणभेरी): ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के अवसर पर काशी के अस्सी क्षेत्र स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर में परंपरागत स्नान उत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का काशी के 84 घाटों से लाए गए पवित्र गंगाजल से विशेष अभिषेक किया गया। सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और दिनभर दर्शन-पूजन का सिलसिला चलता रहा।
भोर से शुरू हुई धार्मिक रस्में
मंदिर में तड़के लगभग 5 बजे मंगला आरती के साथ धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत हुई। आरती के बाद भगवान को पांच प्रकार के मेवों का भोग अर्पित किया गया। इसके उपरांत श्रद्धालुओं ने गंगाजल, तुलसी की मालाएं और मौसमी फलों से भगवान की पूजा-अर्चना की। सुबह से लेकर देर शाम तक भक्तों का मंदिर पहुंचने का क्रम लगातार जारी रहा।
अस्सी घाट से निकली गंगाजल यात्रा
स्नान उत्सव के लिए अस्सी घाट से महिलाओं ने डमरू दल के साथ पारंपरिक शोभायात्रा निकाली। श्रद्धालु कलशों में गंगाजल भरकर भजन-कीर्तन करते हुए मंदिर पहुंचे, जहां विधि-विधान से भगवान का जलाभिषेक किया गया। पूरे मंदिर परिसर में धार्मिक उल्लास और भक्ति का वातावरण देखने को मिला।
गुलाबी वस्त्रों में दिए दर्शन
विशेष अवसर पर भगवान जगन्नाथ को आकर्षक गुलाबी रंग के वस्त्र पहनाए गए। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर स्थापित विशेष सिंहासन पर विराजमान भगवान के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। देश के विभिन्न राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्त इस पर्व में शामिल होने पहुंचे।

जलाभिषेक के बाद शुरू होगा 15 दिनों का एकांतवास
मंदिर की परंपरा के अनुसार स्नान उत्सव के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अस्वस्थ माने जाते हैं। मान्यता है कि अत्यधिक मात्रा में जल से स्नान कराने के कारण तीनों देव विग्रह बीमार पड़ जाते हैं। इसके बाद वे 15 दिनों तक विश्राम करते हैं और इस दौरान श्रद्धालुओं को उनके दर्शन नहीं होते।
इस अवधि में भगवान को औषधीय गुणों से युक्त परवल के काढ़े का भोग अर्पित किया जाता है। यह परंपरा भगवान के स्वास्थ्य लाभ का प्रतीक मानी जाती है।
‘अनासरा’ कहलाता है यह विशेष काल
मंदिर के प्रधान पुजारी पंडित राधेश्याम पांडेय के अनुसार, ज्येष्ठ पूर्णिमा पर होने वाला यह स्नान उत्सव प्राचीन परंपरा का हिस्सा है। स्नान के बाद भगवान के एकांतवास की अवधि को पुरी की परंपरा में “अनासरा” कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह के पट बंद रहते हैं और किसी भी श्रद्धालु को दर्शन नहीं कराए जाते।

15 दिन बाद मनाया जाएगा नैनासार उत्सव
एकांतवास समाप्त होने के बाद भगवान के स्वस्थ होने की खुशी में नैनासार उत्सव आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है, नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं तथा पुनः श्रद्धालुओं को दर्शन दिए जाते हैं। इसके बाद भगवान की रथयात्रा की तैयारियां भी आरंभ हो जाती हैं।
पुरी न जा पाने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो श्रद्धालु ओडिशा स्थित भगवान जगन्नाथ के प्रसिद्ध धाम तक नहीं पहुंच पाते, उन्हें काशी के इस मंदिर में दर्शन करने से भी समान आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होता है। इसी विश्वास के चलते हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा पर दूर-दराज के राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
ऐतिहासिक महत्व भी रखता है मंदिर
वाराणसी के अस्सी क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन भगवान जगन्नाथ मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार मंदिर का निर्माण वर्ष 1711 ईस्वी के आसपास हुआ था। आज भी यह मंदिर काशी की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल है।
