आखिर कब थमेगी बनारस के घाटों पर मौत का साया !

आखिर कब थमेगी बनारस के घाटों पर मौत का साया !

गंगा में डूबने की घटनाएं बनीं चुनौती, तमाम दावों के बावजूद नहीं थम रहा सिलसिला
घाटों की गहराई और अनजान खतरा, सीढ़ियों के नीचे है मौत की खाई

वाराणसी (रणभेरी): धर्मनगरी काशी के 84 घाटों पर हर दिन आस्था का सैलाब उमड़ता है। गंगा स्नान, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लेकिन इसी आस्था की डगर पर लापरवाही अब लगातार मौत का कारण बनती जा रही है। गंगा घाटों पर डूबने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं, और हर हादसे के बाद उठने वाले सुरक्षा के सवाल कुछ दिनों में फिर ठंडे बस्ते में चले जाते हैं।

अस्सी घाट से लेकर तुलसी घाट, शिवाला, मुंशी घाट, अहिल्याबाई घाट, पांडे घाट, सिंधिया घाट, रविदास घाट और चौसट्टी घाट तक लगभग हर प्रमुख घाट पर समय-समय पर ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जहां जरा सी चूक लोगों की जान पर भारी पड़ जाती है। हाल ही में गाजीपुर निवासी होनहार छात्र तुषार राय की तुलसी घाट पर डूबने से हुई मौत ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी।

आखिर कब थमेगी बनारस के घाटों पर मौत का साया !

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर प्रयास तो होते हैं, लेकिन वह जमीनी हकीकत में पर्याप्त साबित नहीं हो रहे। गर्मी के मौसम में जब घाटों पर भीड़ अचानक बढ़ जाती है, तब यह खतरा और अधिक गंभीर रूप ले लेता है।
घाटों पर सबसे बड़ा खतरा गंगा नदी की अनियमित गहराई है। स्थानीय नाविकों और पुराने निवासियों के अनुसार, कई घाटों पर सीढ़ियों के ठीक नीचे पानी अचानक बहुत गहरा हो जाता है।

बाहर से देखने पर यह समझ पाना मुश्किल होता है कि कौन सा हिस्सा सुरक्षित है और कौन सा नहीं। नहाने आए श्रद्धालु अक्सर इसी भ्रम का शिकार हो जाते हैं। जैसे ही वे आगे बढ़ते हैं, अचानक गहराई बढ़ जाती है और पैर जमीन से हटते ही संतुलन बिगड़ जाता है। तैरना न जानने वालों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित होती है। कई बार तो लोग किनारे से कुछ ही कदम दूर जाकर गहरे पानी में समा जाते हैं, और आसपास मौजूद लोग भी उन्हें बचा नहीं पाते।

गर्मी के दिनों में घाटों पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। सुबह से लेकर शाम तक स्नान और दर्शन के लिए भारी भीड़ जुटती है। इसी भीड़ में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि लोग सुरक्षा नियमों की अनदेखी करते हैं। कई श्रद्धालु गहरे पानी में चले जाते हैं, कुछ सेल्फी या स्नान के दौरान असावधानी बरतते हैं। बच्चों और युवाओं में रोमांच के कारण जोखिम और बढ़ जाता है। स्थानीय गोताखोर और नाविक बार-बार चेतावनी देते हैं, लेकिन भीड़ के दबाव में कई बार उनकी बात अनसुनी रह जाती है।

प्रशासन की ओर से समय-समय पर सुरक्षा के दावे किए जाते हैं। चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और गोताखोरों की तैनाती की बात भी होती है। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये व्यवस्थाएं केवल प्रमुख घाटों तक सीमित रह जाती हैं और भीड़ के समय प्रभावी नहीं रहतीं। पर्याप्त लाइफगार्ड की कमी, निगरानी व्यवस्था की कमजोर कड़ियाँ और जागरूकता की कमी मिलकर हालात को गंभीर बना देती हैं। हर हादसे के बाद जांच और आश्वासन तो मिलता है, लेकिन स्थायी समाधान अब भी दूर दिखाई देता है। गंगा की लहरों पर तैरती आस्था के बीच बढ़ती यह लापरवाही अब प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है। सवाल यही है कि आखिर कब तक घाटों पर यूं ही मौत का साया मंडराता रहेगा, और कब इस पवित्र धारा में सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था जमीन पर दिखाई देगी।

सुरक्षा इंतज़ामों के बावजूद नहीं थम रहे हादसे

जल पुलिस, पुलिस कमिश्नरेट और नगर निगम की ओर से गंगा घाटों पर लगातार सुरक्षा इंतज़ाम किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद डूबने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। प्रमुख घाटों पर बैरिकेडिंग लगाकर खतरनाक क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है, वहीं श्रद्धालुओं और पर्यटकों को सावधानी बरतने के लिए लगातार अनाउंसमेंट भी किए जाते हैं।

इसके अलावा विभिन्न घाटों पर चेतावनी वाले सांकेतिक बोर्ड भी लगाए गए हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से गहरे पानी में न जाने की अपील की गई है। इसके बावजूद भी कई लोग लापरवाही बरतते हुए गहरे पानी की ओर चले जाते हैं, जिससे हादसे हो जाते हैं। स्थानीय प्रशासन की तमाम कोशिशों के बीच लगातार हो रही ये घटनाएं चिंता का विषय बनी हुई हैं और सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही हैं।

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