(रणभेरी): अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर विमानन उद्योग पर दिखने लगा है। इसी क्रम में टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयरलाइन एअर इंडिया ने बड़ा फैसला लेते हुए जून से अगस्त के बीच अपने छह विदेशी मार्गों पर सेवाएं अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की है।
एयरलाइन के अनुसार, मौजूदा हालात में कुछ अंतरराष्ट्रीय रूट आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रह गए हैं, खासकर तब जब कई देशों के हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध और डायवर्जन के कारण उड़ानों की दूरी और ईंधन खपत दोनों बढ़ गए हैं।
किन रूटों पर सेवाएं रहेंगी बंद
एअर इंडिया ने जिन मार्गों पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया है, उनमें प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय उड़ानें शामिल हैं-
दिल्ली–शिकागो (अमेरिका)
मुंबई–न्यूयॉर्क (अमेरिका)
दिल्ली–शंघाई (चीन)
चेन्नई–सिंगापुर
मुंबई–ढाका (बांग्लादेश)
दिल्ली–माले (मालदीव)
इन रूटों को कंपनी ने फिलहाल निलंबित रखते हुए परिचालन लागत में संतुलन बनाने की रणनीति अपनाई है।
वैश्विक तनाव और तेल की कीमतों ने बढ़ाई मुश्किलें
मध्य पूर्व में जारी तनाव और ईरान–अमेरिका संबंधों में आई तल्खी के चलते कई देशों ने अपने एयरस्पेस पर प्रतिबंध और कड़े नियम लागू कर दिए हैं। इसके कारण उड़ानों को वैकल्पिक और लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे यात्रा अवधि और ईंधन खर्च दोनों में बढ़ोतरी हुई है।
वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हाल के महीनों में लगभग 45 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। इसका सीधा असर विमानन ईंधन (ATF) पर पड़ा है, जो एयरलाइंस के लिए सबसे बड़ा खर्च होता है।
ईंधन खर्च ने बिगाड़ा पूरा गणित
विमानन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, पहले एयरलाइंस के कुल परिचालन खर्च में ईंधन की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इससे कंपनियों की लाभप्रदता पर भारी दबाव पड़ा है।
हालांकि घरेलू उड़ानों में कीमतों पर कुछ नियंत्रण रखा गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिचालन पर लागत का असर कहीं अधिक गंभीर है।
हर महीने 1200 से अधिक अंतरराष्ट्रीय उड़ानें जारी
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि कटौती के बावजूद उसके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का बड़ा हिस्सा पहले की तरह जारी रहेगा। एअर इंडिया हर महीने औसतन 1200 से अधिक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन करती रहेगी।
वर्तमान संचालन के तहत-
- उत्तरी अमेरिका के लिए प्रति सप्ताह 33 उड़ानें
- यूरोप और ब्रिटेन के लिए 100 से अधिक उड़ानें
- दक्षिण-पूर्व एशिया और सार्क देशों के लिए लगभग 158 उड़ानें
- ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के लिए क्रमशः 8 और 7 साप्ताहिक उड़ानें
- लगातार घाटे से जूझ रही एयरलाइन
हाल ही में समाप्त वित्तीय वर्ष में कंपनी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, एयरलाइन को करीब 220 अरब रुपये का रिकॉर्ड घाटा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी की वित्तीय स्थिति पर कई कारकों का दबाव है—पुराने विमानों के रखरखाव पर बढ़ता खर्च, नए बेड़े में भारी निवेश, और अंतरराष्ट्रीय परिचालन की ऊंची लागत।
खर्च बढ़ने के प्रमुख कारण
एयरलाइन के नुकसान के पीछे तीन प्रमुख वजहें सामने आ रही हैं—
- भू-राजनीतिक तनाव: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के चलते यूरोप और अमेरिका जाने वाली उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे उड़ान अवधि और ईंधन खपत दोनों बढ़ गए हैं।
- भारी निवेश योजनाएं: कंपनी अपने बेड़े के आधुनिकीकरण और केबिन अपग्रेड पर बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है, जिसका असर मौजूदा वित्तीय संतुलन पर पड़ा है।
- संचालन लागत में वृद्धि: पुराने विमानों के रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स की बढ़ती कीमतें और अन्य परिचालन खर्चों ने भी कंपनी पर दबाव बढ़ाया है।
आगे की रणनीति पर नजर
एअर इंडिया की यह कटौती अस्थायी मानी जा रही है और इसे लागत नियंत्रण रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। कंपनी आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की समीक्षा कर पुनः संचालन की योजना पर विचार कर सकती है।
फिलहाल, वैश्विक अनिश्चितताओं और ईंधन कीमतों के बीच विमानन उद्योग एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है, जिसका असर आने वाले समय में टिकट दरों और उड़ानों की उपलब्धता पर भी देखने को मिल सकता है।
