संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा में जसपिंदर नरुला ने बांधा समां, बारिश में भी झूमे श्रोता

संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा में जसपिंदर नरुला ने बांधा समां, बारिश में भी झूमे श्रोता

वाराणसी (रणभेरी): मुक्ताकाशीय मंच पर चल रहे प्रख्यात संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा बुधवार की रात यादगार बन गई। तीसरी निशा में आकर्षण का केन्द्र मुंबई से आई हुई प्रख्यात गायिका पद्मश्री जसपिंदर नरुला रहीं। जसपिंदर नरुला ने हनुमत दरबार में न केवल अपने संग सभी को झूमाया और साथ ही नाचने के लिए भी बाध्य कर दिया।

लोग झूमते रहे और नाचते रहे। कार्यक्रम के दौरान रिमझिम फुहार भी होने लगी लेकिन श्रोता भी कहां हटने वाले थे। हनुमानजी के आंगन में हर सभी रिमझिम बारिश में भी उसी तरह डटे रहे। रात्रि लगभग दस बजे मंच पर प्रख्यात गायिका पद्मश्री जसपिंदर नरुला का पदार्पण हुआ। हर किसी ने उनका तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्वागत किया। जसपिंदर नरुला का गायन सुनने के लिए दरबार के आंगन ही नहीं छत पर भी श्रोता जमे रहे। बड़े-बड़े एलडी स्क्रीन के बाहर भी लोग उनके गायन का आनंद लेते रहे।

मंच संभालने के बाद उन्होंने कहा कि जब प्रभु के समक्ष मन से इच्छा की जाती है तो वह पूरी हो ही जाती है। उन्होंने जय श्रीराम के जयकारे के साथ गायन की शुरुआत की। कहा कि एक गुलदस्ता प्रभु की चरणों में पेश कर रही हूं। उन्होंने प्रभुजी दया करो मन में आन बसो सुनाया तो हर कोई मगन हो गया। जसपिंदर नरुला श्रोताओं से सीधे मुखातिब थीं। बोलीं- जिस दूल्हे की शादी हो उसी की बात की जाती है। हम जिसके लिए आये हैं उन्हीं की बात करते हैं। एक और भजन सुनाया। हनुमानजी महावीर तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले। श्रोताओं से बोलीं- आप ऐसे श्रोता तो हमें शायद पहली बार मिले हैं। तीसरा भजन सुनाया- मनवा रे जीवन है संग्राम, इसलिए भज ले राम-राम। जसपिंदर नरुला मंच पर बैठ कर गा रहीं थीं। बोलीं- मुझे लगता है कि खड़ा होकर गाना पड़ेगा। भइया जरा माइक निकाल कर दीजिए।

संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा में जसपिंदर नरुला ने बांधा समां, बारिश में भी झूमे श्रोता

हाथों में माइक थाम कर जसपिंदर नरुला खड़ी होकर गाने लगी। कहा- मेरा तो ऐसा मन करता है कि इंडस्ट्री से निकल कर इसी तरह भजन करते रहे। कहा कि- आप लोग हाथ ऊपर उठा कर हमारे साथ मिल कर गाइये- तू न संभाले तो हमें कौन संभाले। जसपिंदर नरुला एक भजन बच्चों के लिए भी सुनाया। सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाये तरुवर की छाया.. हे गोविंद हे गोपाल हे दयानिधान के बाद मेरी झोंपड़ी के भाग आज जग जायेंगे राम आयेंगे। रात्रि 12.45 बजे उनका कार्यक्रम समाप्त हुआ। तीसरी निशा का प्रथम कार्यक्रम पुणे से आये पं. उल्हास कसालकर का गायन था। उन्होंने अपने गायन से हर किसी को रससिक्त किया। उनके साथ सुरेश तलवलकर (तबला-पुणे), विनय मिश्र (संवादिनी- दिल्ली) पर संगत कर रहे थे। तत्पश्चात मुंबई से आये पंं. विवेक सोनार का बांसुरी वादन हुआ।

उन्होंने बांसुरी पर धुन छेड़ कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके साथ तबले पर शुभ महराज संगत कर रहे थे। कार्यक्रम की चौथी प्रस्तुति कौशिकी चक्रवर्ती का गायन था। उनके साथ आर्विंक बनर्जी (तबला- कोलकाता), उस्ताद मुराद अली खां, (संवादिनी- कोलकाता) व ज्योर्तिमर्य बनर्जी (संवादिनी-कोलकाता) संगत कर रहे थे। पांचवीं प्रस्तुति में पं. देवाशीष भट्टाचार्य ने स्वनिर्मित राग हनुमंत से आराधना की। उन्होंने आलाप, जोड़, झाला बजाने के बाद पारम्परिक रचनाओं की धुन सुनायी। उनके साथ संजू सहाय (तबला) पर संगत कर रहे थे।

तत्पश्चात युवा कलाकार महेश काले का गायन हुआ। उन्होंने रागश्री में गायन किया। ब्रह्म मुहुर्त के इस राग में आलाप के दौरान स्वरों की शुद्धता खास रही। कहा कि जिस मंच पर हमारे पूर्वजों ने उपस्थिति दर्ज करायी उसी मंच पर बैठ कर बहुत ही अच्छा लग रहा है। तीसरी निशा की अंतिम प्रस्तुति कोलकाता के पं. आलोक लाहिड़ी का संरोद वादन रहा। उन्होंने वसंत मुखारी राग में वादन किया। आलाप, जोड़, झाला के बाद झप ताल और तीन ताल में निबद्ध दो संगीत रचनाएं सुनायी। पहाड़ी धुन का सुरीला वादन किया। तबले पर उनके साथ समर साहा (कोलकाता) ने संगत की। संचालन साधना श्रीवास्तव व सौरभ चक्रवर्ती कर रहे थे।

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