इबादत में जुटे बुजुर्गों के साथ युवा, कंकड़िया बीर और लोहता की मस्जिद में पूरे 30 दिन एतिकाफ की परंपरा
वाराणसी (रणभेरी): मुकद्दस रमजान के अंतिम अशरे की शुरुआत के साथ ही बनारस की मस्जिदों में एतिकाफ की इबादत शुरू हो गई है। मगरिब की अजान के बाद अकीदतमंद मस्जिदों में दाखिल होकर अल्लाह की इबादत में मशगूल हो गए। अब ये इबादतगुजार अगले दस दिनों तक मस्जिदों में रहकर नमाज, कुरआन की तिलावत और दुआ में समय बिताएंगे और ईद का चांद दिखाई देने के बाद ही बाहर निकलेंगे।
रमजान के इस खास दौर में शहर की मस्जिदों में सुबह और शाम बड़ी संख्या में रोजेदार इफ्तार और नमाज के लिए पहुंच रहे हैं। नमाज के बाद लोग एक-दूसरे से गले मिलकर दुआ करते हैं। मस्जिदों का माहौल पूरी तरह इबादत और आध्यात्मिकता से सराबोर नजर आ रहा है। बुजुर्गों के साथ-साथ बड़ी संख्या में युवा भी एतिकाफ में बैठकर अल्लाह की इबादत में लीन हैं। इस्लाम में रमजान का आखिरी अशरा बेहद अहम माना जाता है। इसे जहन्नुम की आग से निजात दिलाने वाला दौर कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान की गई सच्चे दिल से इबादत और दुआ को अल्लाह कबूल करता है और अपने बंदों के गुनाहों को माफ कर देता है। यही कारण है कि इन दिनों मस्जिदों में इबादत करने वालों की संख्या काफी बढ़ जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी अशरे में शब-ए-कद्र की मुबारक रात भी आती है। इस रात की इबादत को इस्लाम में बेहद खास दर्जा दिया गया है। कहा जाता है कि इस रात की गई इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत के बराबर मिलता है। इसलिए बड़ी संख्या में लोग पूरी रात जागकर नमाज, कुरआन की तिलावत और दुआ में मशगूल रहते हैं।
शहर की अधिकांश मस्जिदों में रमजान के आखिरी दस दिनों में एतिकाफ किया जाता है, लेकिन बनारस की दो मस्जिदें ऐसी भी हैं जहां पूरे 30 दिन तक एतिकाफ की परंपरा निभाई जाती है। कमच्छा स्थित कंकड़िया बीर मस्जिद और लोहता की मस्जिद में पिछले छह वर्षों से यह सिलसिला जारी है। इन दोनों मस्जिदों में इस समय 40 से अधिक लोग एतिकाफ में शामिल होकर पूरे रमजान इबादत में लीन हैं।
मस्जिदों के जिम्मेदारों के अनुसार यह इबादत समाज में अमन, खैर-बरकत और रहमत की दुआ के लिए की जाती है। रमजान के अंतिम दिनों में शहर की मस्जिदों का माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया है और रोजेदार पूरी श्रद्धा के साथ अल्लाह की रहमत और मगफिरत की उम्मीद में इबादत कर रहे हैं।
