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Sunday, March 20, 2016

     

‘शहर चाहे कोई भी हो, रंगा है एक ही रंग में, कृष्ण की नगरी मथुरा से लेकर शिव की नगरी बनारस तक पारंपरिक रंगों की बौछार है, दिल्ली से लेकर पटना और कोलकाता तक त्योहार का रंग अपना असर दिखला रहा है।’


विविधताओं से भरे इस देश में एक ही पर्व के अनेक रंग देखे जाते हैं, आइए जानते हैं देशभर के कुछ मशहूर शहरों की होली...



काशी मे होली मनाने की अनुठी परम्परा

वकाशी मे होली मनाने की अनुठी परम्परा


     उत्सवों का शहर काशी अपनी सांस्कृतिक विरासत के कारण पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है,यहां की होली भी देशभर में मशहूर है, यहाँ होली के ५ दिन पहले रंगभरी एकादशी से ही होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। फाल्गुन शुक्ल की एकादशी काशी में रंगभरी एकादशी अर्थात रंगो के उत्सव के रुप मनाया जाता है। परम्परा अनुसार होली के पहले काशी अधिपति बाबा विश्वनाथ,माता अन्नपूर्णा का गौना करा कर वापस काशी आए थे। वर्षभर में एक मात्र इसी दिन बाबा एवं माता की चल रजतप्रतिमा के दर्शन होते हैं। हर काशीवासी के मन में बाबा के साथ होली खेलने की इच्छा होती है, काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत बताते है कि बसंत पंचमी को बाबा का तिलकोत्सव,महाशिवरात्रि को विवाह उत्सव तथा रंगभरी एकादशी को बाबा का गौना उत्सव को मनाने की काशी में पुरातन परम्परा है। मान्यता है कि इस दिन देवलोक से सारे देवी-देवता बाबा के ऊपर गुलाल पेâंकते हैं। काशी का ये महोत्सव २०० वर्ष से ज्यादा पुराना है, बाबा के साथ होली खेलने के लिए काशी की गलियों में जनसैलाब उमड़ पड़ता है। पूरी काशी रंगभरी एकादशी के दिन अबीर,गुलाल से नहा उठती है। इसके लिए महंत आवास पर विशेष आयोजन किया जाता है। बाबा के गौना उत्सव के लिए बाबा के कपड़े खादी से और माता के बनारसी सिल्क से बनाए जाते है, बाबा की पगड़ी सोने एवम चाँदी के तारों से निर्मित की जाती है, इसके लिए चाँदी की पालकी जो कि २०० वर्ष से भी ज्यादा पुरानी है उसे घी,शहद,दूध से चमकाया जाता है। तत्पश्चात महंत आवास से पालकी यात्रा शुरु हो कर पूरे काशी में घुमाई जाती है। काशी मे बाबा की यात्रा में काशी के सुप्रसिद्ध काशी विश्वनाथ डमरु दल के ३ दर्जन से ज्यादा लोग डमरु की सुमधुर ध्वनि के साथ बाबा की पालकी के आगे चलते हुए वातावरण को शिवमय कर देते हैं। बाबा की रजत प्रतिमा के दिव्य दर्शन के लिए भक्त वर्षभर इसी दिन की प्रतिक्षा करते हंै। इसी कारण उत्सवों के रसीया शहर काशी की होली विश्व में काशी को अलग कर रही है। काशी नगरी रंगभरी एकादशी के दिन अबीर,गुलाल से नहा उठती है। काशी में उनकी पालकी यात्रा को घुमा कर वापस मंदिर मे लायी जाती है, इस तरह की आध्यात्मिक यात्रा को देखने के लिए विश्व के कोने-कोने से भक्तो की जुटान होती है। वर्षभर मे काशी विश्वनाथ की ये एक मात्र यात्रा रंगभरी एकादशी के दिन ही निकाली जाती है, इस तरह से होली खेलने की काशीवासियों की बाबा से रंग खेलने की अनुमति मांगने की अदभूत परम्परा है।यही वजह है कि भारत में काशी की होली सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।


बरसाने की लट्ठमार होली

वाबरसाने की लट्ठमार होली


      ब्रज के बरसाना गाँव में होली एक अलग तरह से खेली जाती है जिसे लट्ठमार होली कहते हैं। ब्रज मंज वैसे भी होली ़खास मस्ती भरी होती है क्योंकि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है। यहाँ की होली में मुख्यत: नंदगाँव के पुरूष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं, क्योंकि कृष्ण नंदगाँव के थे और राधा बरसाने की थीं। नंदगाँव की टोलियाँ जब पिचकारियाँ लिए बरसाना पहुँचती हैं तो उनपर बरसाने की महिलाएँ खूब लाठियाँ बरसाती हैं। पुरूषों को इन लाठियों से बचना होता है और साथ ही महिलाओं को रंगों से भिगोना होता है। नंदगाँव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली की लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है। अगर चोट लगती भी है तो लोग घाव पर मिट्टी मलकर ़िफर शुरू हो जाते हैं। इस दौरान भाँग और ठंडाई का भी ़खूब इंत़जाम होता है। कीर्तन मण्डलियाँ ‘‘कान्हा बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’’, ‘‘फाग खेलने आए हैं नटवर नंद किशोर’’ और ‘‘उड़त गुलाल लाल भए बदरा’’ जैसे गीत गाती हैं। कहा जाता है कि ‘‘सब जग होरी, जा ब्रज होरा ‘‘याने ब्रज की होली सबसे अनूठी होती है।


फूलो की होली

वफूलो  की होली


     रंगों का खूबसूरत त्योहार होली जो फाल्गुन महीने में हर किसी को रंगीन बना देता है। वैसे तो पूरे देश में यह त्योहार काफी धूम-धाम से मनाया जाता है पर ब्रज मंडल की बात ही कुछ और है जहाँ रंगों की होली के अलावा फूलो से भी होली मनायी जाती है।



राजस्थान की होली

राजस्थान की होली


     गुलाल के गोटे से होली खेलना राजस्थान की एक विशेष पहचान रही है पुराने समय में राजस्थान के राजपूतानों में इससे होली खेली जाती थी इससे शरीर की त्वचा को कोई नुकसान नहीं पहुंचता गुलाल का गोटा बनाने में लाख का प्रयोग किया जाता है इस लाख को किसी पतली पूंâकनी के सहारे गोलाकार रूप में पूâलाया जाता है इसके बाद इसमें विभिन्न रंगों का अबीर-गुलाल भरा जाता है इसको सामने वाले पर पेंâक कर मारने पर यह पूâटता है और विविध रंगों का एक गुबार हवा में तैरने लगता है।

     राजस्थान में इन दिनों समुद्र की सीप के बारीक पाउडर से मोती जैसा रंग तैयार किया जात है और इसकी मांग सबसे ज्यादा है इस रंग से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता है और इसमें चमक भी ज्यादा होती है।हर्बल गुलाल के निर्माता बताते हैं कि वह गुलाल में उच्च गुणवत्ता वाले मक्के का स्टार्च इस्तेमाल करते हैं और यह शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता।



बिहार की खास ‘कुर्ता फाड़ होली

बिहार की खास ‘कुर्ता फाड़ होली


     देश के अलग-अलग हिस्सों में होली की अलग-अलग परंपरा है ब्रज के एक इलाके में लट्ठमार होली तो दूसरे इलाके में होली की अलग आकर्षक परंपरा चली आ रही है ऐसे में बिहार में होली के एक चलन ने अपना ही रंग जमा लिया है यह चलन है ‘कुर्ता फाड़ होली’ का। मजेदार यह है कि होली की यह परंपरा मर्दो तक ही सीमित नहीं है और न ही यह किसी खास वर्ग की परंपरा है,बिहार में होली के गायन की अपनी परंपरा रही है और यह वर्ग और क्षेत्र के हिसाब से बंटती चली जा रही है होली गीतों के गायन से क्षेत्र विशेष के लोगों के बीच परंपराओं की जानकारी मिल जाती है।

     सुबह में कादो (कीचड़) का खेल चला करता था इसमें कीचड़ के साथ गोबर का मिश्रण बनाया जाता था, जिससे होली खेली जाती थी सुबह १० से ११ बजे तक इस होली का चलन था इसी क्रम में कपड़े शरीर से अलग किए जाते थे, ताकि कीचड़ से पूरा शरीर रंगा हुआ नजर आए दो समूहों में बंटे लोग एक-दूसरे पर इसे आजमाते थे। इसके बाद समय शुरू होता था रंग का इसमें दांतों को रंगना बहुत महत्वपूर्ण था रंगने वाले को विजेता और जिसको रंगा गया वह पराजित माना जाता था फिर गालियों का दौर शुरू होता था समवेत गायन में गालियां गाई जाती थीं रंगों का दौर दोपहर दो बजे के बाद खत्म हो जाता था और तब गुलाल और होली गायन का दौर शुरू होता था बदलते समय में गायन खत्म हो गया है पर कुर्ता फाड़ होली जिंदा है, क्योंकि लालू प्रसाद के समय में इस परंपरा को काफी तूल मिला और प्रचार भी। आज यह अपने शबाब पर है और इसे सभी आजमाते हैं।