वाराणसी (रणभेरी): काशी में बुधवार को दुर्गा पूजा पंडालों में मां दुर्गा की विदाई की तैयारियां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ की जा रही हैं। बंगाली समुदाय की महिलाएं सिंदूर खेला की रस्म निभाकर माता रानी को विदा कर रही हैं। इससे पहले दर्पण में मां दुर्गा का प्रतीकात्मक विसर्जन किया गया। इसके बाद विभिन्न परंपराओं का निर्वहन करते हुए मां को अगले वर्ष फिर आने के निमंत्रण के साथ विदाई दी जा रही है।
दर्पण विसर्जन के बाद सिंदूर खेला की रस्म
बंगाली परंपरा में दर्पण के माध्यम से मां दुर्गा का प्रतीकात्मक विसर्जन किया जाता है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला की रस्म पूरी करती हैं। विदाई के दौरान केले के पत्ते, फल और चावल से जुड़ी पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं। इन रीति-रिवाजों के माध्यम से मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देकर अगले साल दोबारा आगमन की प्रार्थना की जाती है।
बेटी के मायके आने और ससुराल लौटने का प्रतीक
पूजा में शामिल डॉ. चक्रवर्ती के अनुसार, सिंदूर खेला की परंपरा मां दुर्गा को बेटी के रूप में मायके बुलाने की भावना से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा अपने चार बच्चों के साथ मायके आती हैं और परिवार के सदस्य बेटी की तरह उनका स्वागत करते हैं।

उन्होंने बताया कि जिस तरह मायके से विदा होने वाली बेटी को फल और अन्य उपहार देकर ससुराल भेजा जाता है, उसी भाव के साथ मां दुर्गा की विदाई की जाती है। सिंदूर खेला इसी पारिवारिक अपनत्व और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है। मां दुर्गा के मायके से लौटने की इस परंपरा में खुशी के साथ विदाई का भाव भी जुड़ा रहता है।
21 अक्टूबर को निभाई जा रही विदाई की परंपरा
इस वर्ष महानवमी 19 अक्टूबर और विजयादशमी 20 अक्टूबर को मनाई गई। वहीं, काशी में बंगाली समुदाय के कई पूजा आयोजनों में बुधवार, 21 अक्टूबर को मां दुर्गा की विदाई से जुड़ी रस्में निभाई जा रही हैं। पूजा पंडालों में श्रद्धालु पारंपरिक विधियों के साथ माता रानी को विदा कर रहे हैं और अगले वर्ष फिर उनके आगमन की कामना कर रहे हैं।
