(रणभेरी): कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका ने हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल अपनी याचिका वापस ले ली। सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन पिटीशन का कानूनी विकल्प उपलब्ध है, तो सीधे हाईकोर्ट का रुख क्यों किया गया। कोर्ट की टिप्पणियों के बाद दोनों नेताओं ने याचिका वापस लेने का फैसला किया।
रिवीजन पिटीशन दाखिल करने के विकल्प पर जोर
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को पहले उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी प्रक्रिया अपनाने पर विचार करना चाहिए था। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के समक्ष उनकी हिरासत से जुड़ी कार्यवाही का परिणाम अभी आना बाकी है।
दोनों नेताओं की ओर से पेश वकील अभिक चिमनी ने 19 अक्टूबर को हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी कि यह फैसला कानूनी रूप से उचित नहीं था और अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाए। हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका की स्वीकार्यता और अपनाए गए कानूनी रास्ते पर सवाल किए।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद हुई थी गिरफ्तारी
मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले हुई कार्रवाई से जुड़ी है। सौरव दास और आशुतोष रांका को उस समय हिरासत में लिया गया था। बाद में उन्हें इस शर्त पर जमानत दी गई थी कि वे शांति व्यवस्था भंग नहीं करेंगे।
इसके बाद 12 अक्टूबर को सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया। अगले दिन, 13 अक्टूबर को दोनों नेता तिरंगा लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। इसके बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया।
14 अक्टूबर को मजिस्ट्रेट अदालत ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया। 19 अक्टूबर को हिरासत की अवधि पूरी होने पर इसे दो दिन के लिए और बढ़ा दिया गया। इसी आदेश को दोनों नेताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
बैरिकेड तोड़ने और शांति व्यवस्था पर भी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर नियमों का उल्लंघन किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि प्रदर्शनकारी बैरिकेड पार करने या तोड़ने में आगे रहते हैं, तो बड़ी संख्या में दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की आशंका पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।
अदालत ने यह भी पूछा कि यदि पहले दिए गए बॉन्ड की शर्तों का दोबारा उल्लंघन होता है, तो क्या संबंधित अधिकारियों को अधिक सख्त शर्तें लगाने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा में मुख्य रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच की जाती है। किसी फैसले में हस्तक्षेप तभी उचित होता है, जब उसमें गंभीर कानूनी खामी दिखाई दे।
हिरासत बढ़ाने के आदेश पर उठाए थे सवाल
CJP नेताओं ने अपनी याचिका में 19 अक्टूबर के आदेश को गलत बताते हुए हिरासत बढ़ाने की कार्रवाई पर आपत्ति जताई थी। उनका पक्ष था कि अधिकारियों के पास इस तरह कस्टडी बढ़ाने का अधिकार नहीं था। बुधवार को हाईकोर्ट में सौरव दास और आशुतोष रांका के अलावा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर भी सुनवाई प्रस्तावित थी। इन याचिकाओं में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के आदेशों को चुनौती दी गई थी। सौरव दास और आशुतोष रांका ने सुनवाई के दौरान अपनी याचिका वापस ले ली।
