वाराणसी (रणभेरी): काशी की आध्यात्मिक चेतना और सनातन परंपराओं का प्रभाव अब देश की सीमाओं से कहीं आगे तक पहुंच रहा है। इसी आस्था और विश्वास के चलते जापान से युवाओं का एक दल करीब 6,850 किलोमीटर की दूरी तय कर वाराणसी पहुंचा। काशी पहुंचने के बाद जापानी श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ समेत शहर के प्रमुख मंदिरों में दर्शन-पूजन किया। इसके बाद उन्होंने दुर्गाकुंड स्थित भगवती दुर्गा मंदिर में मां कुष्मांडा की विशेष पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया।
जापानी श्रद्धालुओं के लिए इस यात्रा का महत्व केवल धार्मिक दर्शन तक सीमित नहीं था। करीब तीन वर्ष पहले काशी यात्रा के दौरान उन्होंने मंदिर में होने वाली पूजा की विधि को करीब से समझा था। जापान वापस लौटने के बाद उन्होंने उसी परंपरा और श्रद्धा के साथ माता की आराधना शुरू कर दी। श्रद्धालुओं का कहना है कि उनकी मनोकामना पूरी होने के बाद उन्होंने दोबारा काशी आने का निर्णय लिया।
मनोकामना पूरी होने पर फिर पहुंचे काशी
जापान से आए श्रद्धालुओं में सुवांग, लियोंग सू रमैया सहित कई अन्य युवा शामिल रहे। सुवांग ने बताया कि लगभग तीन साल पहले उन्होंने काशी की यात्रा की थी। उस समय उन्होंने दुर्गाकुंड स्थित मां के मंदिर में पूजा-अर्चना की और वहां संपन्न होने वाली धार्मिक विधियों को समझने का प्रयास किया।
काशी से जापान लौटने के बाद उन्होंने उसी भाव और विश्वास के साथ माता की पूजा शुरू की। उनका कहना है कि जिस कामना को लेकर उन्होंने मां से प्रार्थना की थी, वह पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने दोबारा काशी आने का संकल्प लिया था।
सुवांग ने कहा कि काशी में उन्हें एक अलग तरह की शांति महसूस होती है। मंदिरों में पूजा-अर्चना और धार्मिक वातावरण उन्हें मानसिक रूप से काफी सकारात्मक अनुभव देता है। इसी आस्था के कारण वह इतनी लंबी दूरी तय कर दोबारा काशी पहुंचे हैं।
उन्होंने बताया कि काशी की आध्यात्मिक ऊर्जा उन्हें आकर्षित करती है और यहां आकर मन को सुकून मिलता है। जापान में रहने के बावजूद सनातन परंपराओं और देवी-देवताओं के प्रति उनकी श्रद्धा बनी हुई है।
बाबा विश्वनाथ समेत कई मंदिरों में किए दर्शन
वाराणसी पहुंचने के बाद जापानी श्रद्धालुओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर समेत शहर के विभिन्न प्रमुख धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। मंदिरों में दर्शन करने के साथ उन्होंने वहां की धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धति को भी करीब से देखा।
इसके बाद श्रद्धालु दुर्गाकुंड पहुंचे, जहां भगवती दुर्गा मंदिर में उनके लिए विशेष धार्मिक अनुष्ठान कराया गया। मंदिर परिसर में वैदिक परंपरा के अनुसार पूजा संपन्न हुई।
21 ब्राह्मणों ने किया दुर्गा सप्तशती का पाठ
जापानी श्रद्धालुओं की विशेष पूजा आचार्य विकास पांडे के निर्देशन में कराई गई। पूजा की शुरुआत धार्मिक विधि-विधान के अनुसार की गई। गणेश पूजन के बाद गौरी तथा पंचांग वेदियों की पूजा संपन्न कराई गई।
इसके बाद 21 ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से दुर्गा सप्तशती का पाठ किया। जापान से आए श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ मंत्रोच्चार और पाठ को सुना। धार्मिक अनुष्ठान के अगले चरण में हवन कराया गया और अंत में माता की आरती हुई।
आचार्य विकास पांडे ने बताया कि जापान से आए श्रद्धालुओं के मन में भगवती के प्रति गहरी आस्था दिखाई दी। उन्होंने कहा कि विदेशी श्रद्धालु होने के बावजूद उनकी धार्मिक भावनाएं और पूजा के प्रति समर्पण काफी गहरा है। वे मां दुर्गा के साथ बाबा विश्वनाथ के प्रति भी श्रद्धा रखते हैं।
भगवती की कृपा पर विश्वास
आचार्य विकास पांडे के अनुसार, जापान से आए श्रद्धालुओं ने बातचीत के दौरान बताया कि वे माता को अपने जीवन में विशेष स्थान देते हैं। उनका विश्वास है कि उन्हें जीवन में जो भी उपलब्धियां मिली हैं, उसमें भगवती की कृपा का महत्वपूर्ण योगदान है।
श्रद्धालुओं ने इसी विश्वास के साथ मां के दरबार में पहुंचकर विशेष पूजा कराई और अपनी आस्था व्यक्त की। मंदिर में हुए अनुष्ठान के दौरान उनका उत्साह और श्रद्धा देखते ही बन रही थी।
काशी की आध्यात्मिक परंपरा बनी आकर्षण का केंद्र
जापान से आए इन युवाओं की काशी यात्रा यह भी बताती है कि वाराणसी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोगों को प्रभावित कर रही है। गंगा घाट, प्राचीन मंदिर, वैदिक अनुष्ठान और सनातन परंपराओं से जुड़ी धार्मिक गतिविधियां विदेशी श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
जापानी श्रद्धालुओं ने कहा कि काशी में उन्हें केवल मंदिरों के दर्शन का अवसर नहीं मिलता, बल्कि यहां का वातावरण उन्हें भीतर से शांति का अनुभव कराता है। यही वजह है कि तीन वर्ष पहले की यात्रा के बाद भी उनका काशी से जुड़ा विश्वास कायम रहा और मनोकामना पूरी होने के बाद उन्होंने दोबारा वाराणसी आने का फैसला किया।
करीब 6,850 किलोमीटर की दूरी तय कर काशी पहुंचे इन श्रद्धालुओं ने मां कुष्मांडा के दरबार में पूजा कर अपनी आस्था को नया संबल दिया। उनके लिए यह यात्रा धार्मिक विश्वास, व्यक्तिगत अनुभव और काशी की आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ाव का विशेष अवसर रही।
