भ्रष्ट व्यवस्था का आईना बनी नगवां चौकी, वर्दी के पीछे छुपा अपराध
‘कलर पट्टी’ का बहाना, अवैध पार्किंग का लाइसेंस ! किसके आदेश पर बदली सड़क की परिभाषा?
तख्त अतिक्रमण, कार नहीं? गरीब पर सख्ती, रसूखदारों पर रहम क्यों?
कमिश्नर का आदेश बनाम ज़मीनी हकीकत, लंका में क्यों बेअसर है पुलिस प्रशासन?
अजीत सिंह
वाराणसी (रणभेरी)। अगर प्रशासनिक विरोधाभास को ज़मीनी हकीकत में देखना हो तो पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का लंका इलाका सबसे सटीक उदाहरण बनकर सामने खड़ा है। यहां सड़कें अब पैदल चलने वालों, स्कूली बच्चों, एंबुलेंस और आम नागरिकों के लिए नहीं रहीं बल्कि रसूखदारों की चारपहिया गाड़ियों की स्थायी पार्किंग में तब्दील हो चुकी हैं। जिस सड़क चौड़ीकरण को जाम से मुक्ति, यातायात सुगमता और सुरक्षा का प्रतीक बताया गया था, वही सड़कें आज महंगी गाड़ियों की कतारों से घिरी कराहती दिखती हैं।
चौड़ी सड़क के नाम पर किए गए दावे काग़ज़ों और प्रेस नोटों तक सिमट गए हैं। हकीकत यह है कि सड़क का बड़ा हिस्सा पार्किंग निगल चुकी है और बची हुई जगह पर आम आदमी जाम में फंसा रहता है। व्यस्त समय में एंबुलेंस सायरन बजाती रह जाती है, स्कूली वाहन रेंगते हैं और दोपहिया चालक जोखिम उठाने को मजबूर होते हैं। इसके बावजूद प्रशासन की नजरें केवल कमजोर तबके पर टिकती हैं। वहीं कार्रवाई होती है, वहीं सख्ती दिखाई जाती है।

सबसे तीखा सवाल यही है कि अगर दुकान के बाहर एक फुट निकला तख्त अतिक्रमण है, तो पूरी सड़क पर कब्जा जमाए खड़ी गाड़ियां किस कानून के तहत वैध हो जाती हैं? अगर ठेले वाले और छोटे दुकानदार अपराधी हैं, तो लाखों की गाड़ियां किस नियम की छतरी तले सजी रहती हैं? क्या कानून की किताबें सिर्फ गरीबों के लिए लिखी गई हैं? अतिक्रमण हटाने के नाम पर जब कार्रवाई होती है तो तख्त उलट दिए जाते हैं, ठेले जब्त होते हैं, नोटिस थमाए जाते हैं और कहीं-कहीं मुकदमे भी दर्ज हो जाते हैं। रोज़ कमाकर परिवार पालने वाले लोग डर और असुरक्षा के साये में जीने को मजबूर हैं। इसके उलट, रसूखदारों की गाड़ियों के लिए बाकायदा ‘जगह’ चिन्हित कर दी जाती है, मानो सड़कें उनकी निजी संपत्ति हों।
यह तस्वीर सिर्फ लंका की नहीं, बल्कि उस दोहरे प्रशासनिक चेहरे की है जहां कानून कमजोर पर सख्त और ताकतवर पर मेहरबान नजर आता है। यही वजह है कि आम जनता अब खुलकर पूछ रही है कि क्या यही विकास है, क्या यही सुशासन है ? अगर नहीं, तो यह व्यवस्था कब बदलेगी ?
पुलिस की खानापूर्ति कब तक?
नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस समय-समय पर अतिक्रमण हटाने के बड़े-बड़े दावे जरूर करते हैं, मगर ज़मीनी सच्चाई हर बार इन दावों की पोल खोल देती है। कार्रवाई होती भी है तो काग़ज़ों और तस्वीरों तक सीमित। कुछ ही घंटों में हालात फिर जस के तस। यह सिलसिला साफ बताता है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है।
कई बार गलत पार्किंग पर वाहन जब्त करने की बात उठती है, लेकिन स्थानीय पुलिस ऐसे कदम उठाने से बचती दिखती है। कारण बताया जाता है कहीं “साहब” नाराज़ न हो जाएं। रसूखदारों, प्रभावशाली लोगों और सिफारिशी नंबर प्लेटों के सामने कानून अचानक कमजोर पड़ जाता है। पुलिसकर्मियों के हाथ कांपने लगते हैं और कार्रवाई टाल दी जाती है।
इसके ठीक उलट, छोटे दुकानदारों और ठेले वालों के मामले में सख्ती पूरी ताकत से दिखाई जाती है। दुकान के सामने रखा स्टूल हो या ठेला, तुरंत अतिक्रमण घोषित। कहीं नोटिस, कहीं जब्ती, कहीं मुकदमा। रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे लोग डर और अपमान का सामना करते हैं। स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि अगर प्रशासन और पुलिस सिर्फ एक सप्ताह ईमानदारी से, बिना भेदभाव कार्रवाई कर लें, तो सड़कें खुद-ब-खुद खाली हो जाएं। लेकिन जब कानून का इस्तेमाल चयनात्मक हो, तो सुधार की उम्मीद बेमानी हो जाती है।

भ्रष्ट व्यवस्था का आईना बनी नगवां चौकी, वर्दी के पीछे छुपा अपराध
कानून की रखवाली करने वाली वर्दी जब खुद कानून को कुचलने लगे, तब समझिए कि समाज के लिए खतरा केवल अपराधी नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर बैठे ऐसे लोग भी हैं, जिनके गलत कर्म आम जनता की सांसें रोक देते हैं। लंका क्षेत्र की नगवां पुलिस चौकी आज उसी कड़वी सच्चाई की मिसाल बनती दिख रही है। सड़कें, जो आम लोगों की आवाजाही के लिए होती हैं, वहां रसूखदारों की महंगी गाड़ियां घंटों बेजान खड़ी रहती हैं। जाम रोज़ की नियति बन चुका है। हालात ऐसे कि कई बार एंबुलेंस तक जाम में फंस जाती है, मरीज तड़पता रहता है और वर्दीधारी तमाशबीन बने रहते हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक सोची-समझी अनदेखी है, जिसका सीधा नुकसान समाज को उठाना पड़ रहा है।
इस पूरे खेल के केंद्र में नगवां चौकी प्रभारी अभिषेक सिंह की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि उनकी शह पर अवैध पार्किंग फल-फूल रही है। गश्त होती है, लेकिन कार्रवाई सिर्फ कागज़ों में। चालान और सीज की तलवार गरीब दुकानदार के तख्त पर तो बेरहमी से गिरती है, मगर रसूखदार की गाड़ी के सामने वही कानून लंगड़ा हो जाता है। यही दोहरा चेहरा पुलिस को जनता की नजरों में कठघरे में खड़ा करता है।
एक पुलिस कर्मी का गलत आचरण केवल नियमों का उल्लंघन नहीं होता, वह पूरे समाज में यह संदेश देता है कि पैसा और पहचान, कानून से बड़े हैं। यही सोच अपराध को जन्म देती है, व्यवस्था को खोखला करती है और आम आदमी के मन से न्याय की आखिरी उम्मीद भी छीन लेती है। नगवां चौकी की कार्यप्रणाली आज कानून व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग बनती दिख रही है।
अब सवाल सिर्फ अवैध पार्किंग का नहीं, सवाल उस मानसिकता का है जो वर्दी पहनकर भी जनहित के खिलाफ खड़ी है। सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस सड़ांध को यूं ही पनपने देंगे, या फिर ऐसे पुलिस कर्मियों के गलत कर्मों पर लगाम लगाकर समाज को यह भरोसा दिलाएंगे कि कानून आज भी जिंदा है।
पुलिस कमिश्नर की साख पर सवाल
शहर में ट्रैफिक सुधार और अतिक्रमण मुक्त सड़कों को लेकर पुलिस कमिश्नर के सख्त संदेशों की साख अगर कहीं सबसे ज़्यादा कमजोर पड़ रही है, तो वह लंका थाना क्षेत्र है। यहां आधी सड़कें वाहन स्वामियों के कब्ज़े में हैं और लंका पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। नतीजा यह कि ऊपर की मंशा काग़ज़ों तक सिमट जाती है और ज़मीन पर वाहन स्वामियों की हुकूमत चलती दिखती है। लंका की सड़कों पर कोई भी वाहन किसी भी दुकान के सामने बेखौफ खड़ा कर दिया जाता है। दुकानदार आपत्ति करे तो उसे ही कानून का पाठ पढ़ाया जाता है “सड़क सरकारी है।” मौके पर पहुंचने वाली पुलिस भी वाहन मालिक से सवाल करने के बजाय दुकानदार को ही अतिक्रमण का दोषी ठहरा देती है।
पुलिस कमिश्नर गलत पार्किंग पर सख्त कार्रवाई की बात करते हैं, लेकिन लंका में वाहन सीज करना मानो वर्जित अपराध बन गया है। अगर कभी सीज होती भी है तो महज़ खानापूर्ति के लिए। डर यही कि कहीं “साहब” नाराज़ न हो जाएं। इसी डर ने कानून को पंगु बना दिया है। आधी सड़क पार्किंग, आधी पर जाम ! एंबुलेंस, स्कूली वाहन और आम राहगीर फंसे रहते हैं, जबकि कार्रवाई सिर्फ वहीं होती है जहां विरोध की ताकत नहीं। अगर यही हाल रहा, तो पुलिस कमिश्नर की सख्त छवि प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह जाएगी।
सवाल सीधा है जब ऊपर से सख्त निर्देश हैं, तो लंका पुलिस उन्हें ज़मीन पर लागू क्यों नहीं कर पा रही? यह अक्षमता है या जानबूझकर की गई अनदेखी? आज लंका पुलिस की यह कार्यशैली न सिर्फ ट्रैफिक व्यवस्था को चौपट कर रही है, बल्कि कानून के प्रति जनता के भरोसे को भी मिट्टी में मिला रही है। जनता अब यह मानने लगी है कि यहां कानून नियमों से नहीं, बल्कि नंबर प्लेट देखकर चलता है।
