(रणभेरी): लोकप्रिय उपन्यासकार कुशवाहा कांत के जीवन और साहित्य पर आधारित वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत की पुस्तक का लोकार्पण शनिवार को नागरी प्रचारिणी सभा में आयोजित एक गरिमामय समारोह में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर भी होता है। ऐसे में कुशवाहा कांत जैसे जनप्रिय साहित्यकार के जीवन और रचनात्मक योगदान को पुस्तक के माध्यम से नई पीढ़ी के सामने लाने का प्रयास अत्यंत प्रशंसनीय है।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि विजय विनीत ने एक पत्रकार होने के साथ-साथ साहित्यिक इतिहास के संरक्षण की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्होंने कहा कि बीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक में हिंदी के लोकप्रिय उपन्यासों की दुनिया में कुशवाहा कांत का विशिष्ट स्थान रहा है। उनकी रचनाओं ने उस दौर के पाठकों को न केवल मनोरंजन दिया, बल्कि सामाजिक चेतना को भी नई दिशा प्रदान की। ऐसे महत्वपूर्ण साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना साहित्यिक जगत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

व्योमेश शुक्ल ने बताया कि पुस्तक की भूमिका लिखने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ, जिसे वे अपने लिए सौभाग्य मानते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यिक जीवनियों का लेखन केवल किसी लेखक के जीवन का विवरण भर नहीं होता, बल्कि उसके समय, समाज और रचनात्मक संघर्षों को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनता है। उनका मानना था कि ऐसी पुस्तकें साहित्यिक परंपरा को सहेजने और पाठकों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं।
अपने उद्बोधन में उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संस्था वर्षों से हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभाती रही है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता दान, ज्ञान और सहयोग की संस्कृति पर आधारित रही है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र तथा राय कृष्णदास जैसे अनेक विभूतियों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज को नई दिशा दी। यदि राष्ट्र को ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में सशक्त बनाना है तो इन आदर्शों को निरंतर आगे बढ़ाना होगा।
कार्यक्रम के दौरान भारत कला भवन और नागरी प्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित एक विशेष कैटलॉग भी अतिथियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। यह कैटलॉग दोनों संस्थाओं के साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करता है। समारोह में इस प्रकाशन की प्रति कुलपति को भेंट की गई। साथ ही कई वरिष्ठ साहित्यकारों, विद्वानों और सांस्कृतिक हस्तियों के चित्र तथा महत्वपूर्ण पुस्तकों का संग्रह भी नागरी प्रचारिणी सभा को समर्पित किया गया।

व्योमेश शुक्ल ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव और युवा पीढ़ी के उत्साह का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने संस्था से जुड़े इंटर्नशिप कार्यक्रम में भाग ले रहे विद्यार्थियों और युवा स्वयंसेवकों की सराहना करते हुए कहा कि यही युवा भविष्य में भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का दायित्व संभालेंगे। उनके भीतर साहित्य और इतिहास के प्रति बढ़ती रुचि समाज के लिए सकारात्मक संकेत है।

समारोह में आयोजित प्रदर्शनी का भी विशेष आकर्षण रहा, जिसमें भारत कला भवन और नागरी प्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक संबंधों से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज, प्रकाशन और सांस्कृतिक सामग्री प्रदर्शित की गई। वक्ताओं ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन न केवल साहित्यिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य करते हैं, बल्कि समाज में भाषा, संस्कृति और इतिहास के प्रति जागरूकता भी बढ़ाते हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि कुशवाहा कांत जैसे साहित्यकारों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। विजय विनीत की यह पुस्तक उस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जो हिंदी साहित्य के इतिहास को नए पाठकों तक पहुंचाने में निश्चित रूप से सार्थक भूमिका निभाएगी।
