बुधवार ,14-अगस्त -19

बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो !



बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो ! बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो ! बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो ! बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो !


प्यार एक गहरा और खुशनुमा एहसास है। जो कहने को तो ढ़ाई अक्षर का होता है लेकिन इस ढ़ाई अक्षर के छोटे से शब्द की गहराई का अंदाजा आज तक कोई न लगा पाया। प्यार उस रंगीन दुनिया का नाम है जो इंसान के बदरंग जिंदगी को रंगीनियत से सराबोर कर देती है। यह तो एक अमूर्त एहसास है जिसका इ़जहार •ाी जुबान से नही बल्कि आंखों से होता है...। और •ाले ही इसका इजहार आंखो से होता हो लेकिन होता तो वह हृदय का •ााव है। प्यार में जरा सा उथल-पुथल से दिल की धड़कन बढ़ जाती है। प्यार हृदय से होता है पर हृदय पर किसी का वश नही होता। वह कब किस पर आ जाएगा कहना कठिन है। प्यार तो अनंत है, असीम है।

मानो या ना मानो मगर प्यार के मामले में स्त्री अधिक भावुक और संवेदनशील होती है। वह कब किसको अपने सर आंखों पर बैठा ले, कब किसे दिल में बसा ले, कब किसे नजरों से गिरा दे, कहना मुश्किल है। प्यार पाने के लिए स्त्री राजपाट, पदवी सब छोड़ने को तत्पर रहती है। एक बार प्रेम का अंकुर फूट आए तो फिर उसे मन से बुहारना मुश्किल है। एक बार वह यदि अपने दिल में किसी को बसा ले तो फिर पूरी दुनिया एक तरफ और दिल की आवा़ज एक तरफ हो जाती है। जापान की राजकुमारी साया ने एक आम नागरिक कुरोदा से विवाह करने के लिए शाही परिवार से अलग हो, राजकुमारी की पदवी त्याग दी थी। जापान के शाही परिवार में ऐसे और भी हादसे हुए हैं। ब्रिटेन के राजकुमार को भी अपने प्रेम की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। बांग्लादेश की अठारह वर्षीय सायरा ने ब्रिटेन की जेल में बंद अपराधी चार्ल्स ब्रोवासन से शादी रचा ली थी, जबकि सायरा चार्ल्स से सिर्फ तीन बार मिली थी। पर्दे पर नारी-अस्मिता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली खूबसूरत अभिनेत्रियों ने अपनी उम्र से काफी बड़े, विवाहित और युवा संतानों के पिता से विवाह कर लिया। नोबेल पुरस्कार विजेता डोरिस लैसिंग ने शायद सही ही कहा है कि औरत ऐसा यथार्थ है, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। मैत्रेयी पुष्पा ने भी सच कहा है कि पुरुष भले ही औरत के शरीर पर बंधन लगा दे, पर उसके स्वच्छंद विचरण करते मन पर प्रतिबंध लगाना उसके वश में नहीं है। कहते हैं कि प्यार उस आजाद परिंदे का नाम है जिसे किसी मुल्क की सरहदें भी रोक नहीं सकती। प्यार उस बहती हवा का नाम है जिसका रूख बदल पाना किसी चट्टान के वश की बात नहीं। प्यार पवित्र नदी की उस बहती धार का नाम है जो इस पूरी कायनात को सवांरती है। प्यार उस खूबसूरत मुलाकात का नाम है जिसमें एक रूह दूसरे रूह से मुखातिब होता है।

आज ऐसी ही एक और सच्ची दास्तां हम करेंगे आपके सामने बयां...! यह दो प्रेमियों की प्रेमकथा से प्रभावित होकर लिखी गयी किसी हिंदी फिल्म की पटकथा नही है। यह वाकया है बेल्जियम और भारत के बीच पनप रहे उस अजीबो-गरीब मोहब्बत का जिसका बीज अंकुरित तो हुआ मगर पनपने से पहले ही उसे कुचल दिया गया। यह दास्तां है बेल्जियम की रहने वाली ब्रिगिट की। जी हां यह सच्ची दास्तां है अपनी सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर एक छोटे से देश बेल्जियम की नीली आंखों वाली नवयुवती ब्रिगिट की । प्रष्ठांस और जर्मनी के पास स्थित यूरोप के बेल्जियम को यूरोप का दिल •ाी कहा जाता है। प्रेमियों के दिल पर दस्तक देने का जरिया माने जाने वाला सबसे आसान व सर्वसुल•ा सामान ''चॉकलेट'' का उत्पादन भी दुनिया में सबसे ज्यादा बेल्जियम में ही होता है। अपनी मोहब्बत की तलाश में बेल्जियम से निकली नीली आंखों वाली ब्रिगिट को आस्ट्रेलिया,जर्मनी,स्पेन,श्रीलंका,मोरक्को और फिर नेपाल के बाद आखिरकार भारत आने के बाद उसकी मोहब्बत मिल ही गयी। अपनी चाहतों को पूरी करने के लिए वह इस कदर दीवानी हो चुकी थी कि वह यह भी भूल गयी कि हर एक मुल्क की एक निश्चित सीमाए होती है, सरहदों के अपने कानून होते हैं जिसके आगे विवश होकर हम जीती हुई बाजी भी हार सकते हैं। अपनी चाहत के लिए बावरी हो चुकी ब्रिगिट ने कभी सपने में भी नही सोचा था कि जिस मोहब्बत को पाने की खातिर आजाद परिंदे की माफिक मुल्क की सरहदों को लांघ कर वह भारत आ पहुँची थी, उसी भारत की सरहदों से बहुत जल्द ही वह बे-आबरू होकर वापिस जाएगी। उसने कभी कल्पना भी नहीं किया होगा कि ह्यअतिथि देवो: •ावह्ण का जयघोष करने वाले देश की सांस्कृतिक राजधानी बनारस में उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा कि उसके दिल के अरमान चूर-चूर हो जायेंगे। उसके लिए यह किसी खौफनाक मंजर से कम नही होगा कि बेल्जियम से भारत और फिर भारत में भारत के अलग-अलग शहरों ऋषिकेशभुनेस्वर,मैसूर,पूरी,जयपुर,उदयपुर के साथ हजारों मील की दूरी तय करने के बाद जिस बनारस में गंगा के तट पर उसकी मुलाकत उसकी मोहब्बत से हो रही है उसी बनारस में धर्म,संस्कृति,संस्कार व स•यता की बात करने वाले लोग उसकी भावनाओ को तार-तार करेंगे। उसे उसकी मोहब्बत से जुदा कर देंगे।

दरअसल बेल्जियम की नीली आंखों वाली नवयुवती ब्रिगिट उस अविवाहित महिला का नाम है जिसे ना जाने क्यों वेद, संस्कृत, कर्मकाण्ड, योगा, संगीत और वैदिक रीति से मोहब्बत हो गयी। मोहब्बत भी कुछ इस तरह की हुई कि मानो जैसे उसने अपना सब कुछ त्याग कर, सारी मोह माया से दूर खुद का जीवन भारतीय संस्कृति,संस्कार,स•यता व वैदिक परम्पराओं के हवाले कर दिया । अपनी इसी चाहत को पाने को आतुर होकर ब्रिगिट चंद महीनों पूर्व भारत आयी और फिर अपनी चाहत को पूरा करने का अरमान सजाकर उसने बनारस में ही रहने का मन बना लिया। जिसके लिए ब्रिगिट ने सम्पूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय की विद्यार्थी बनकर धर्म,संस्कृति व स•यता सहित वैदिक कर्म काण्ड जैसी शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से एक दिन वहा जा पहुँची। चूकि सम्पूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय में यदि उसका प्रवेश हो जाता तो उसी प्रवेश पर ब्रिगिट को बेल्जियम एम्बेसी से स्टूडेंट वीजा मिला जाता। अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए ब्रिगिट ने पूरी शिद्दत से बनारस में सभी छोटे-बड़े शिक्षण संस्थानों का चक्कर लगाना शुरू किया। ब्रिगिट दिल से चाहती थी कि इसी ़िजंदादिल शहर बनारस में रहकर वो अपनी चाहतों को पूरा करे जिसके लिए वह एक दिवानों की तरह कोशिश करने लगी। मगर अफसोस की इस शहर में हर उस व्यक्ति ने उसे शैतानी ऩजरों से देखा जिसे वह इंसान समझकर मिलती थी। क्या आम क्या खास सबने उसकी मजबूरी का नाजायज फायदा उठाना चाहा। किसी ने उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश भी नही की। बनारस में ब्रिगिट का सबसे दु:खद अनुभव सम्पूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ रहा। जहां न केवल ब्रिगिट का मजाक बनाया गया बल्कि ब्रिगिट ने वहां खुद को बेहद अपमानित महसूस किया, और अपने सपनों को टूटता हुआ देखकर वह वहां से लौट गयी।


दर-दर भटकती हुई ब्रिगिट से एक दिन एक मुलाकात इस पंक्ति के अदने से लेखक से हो गयी। ब्रिगिट की भावनाओं और चाहत से प्रभावित होकर हमने उसे वाराणसी के ही पाणिनी कन्या महाविद्यालय से सम्पर्वष्ठ करने की सलाह दे दिया। जहां पहुँचकर ब्रिगिट के सपनों को मानों पंख लग गये हो....पाणिनी कन्या महाविद्यालय की डा.प्रीति विमर्शिनि से मिलकर उनके व्यवहार व सहयोगात्मक रवैये से ब्रिगिट अभिभूत हो गई, उसके पागलपन का कोई ठिकाना ना रहा, इस खुशी को उसने मुझे फोन करके,व्हाट्स अप पर और ई-मेल द्वारा लगभग आधा दर्जन बार पत्र लिखकर अवगत कराया। इसके बाद ब्रिगिट ने बेल्जियम एम्बेसी से सम्पर्वष्ठ किया और पाणिनि कन्या महाविद्यालय से जुड़कर अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए स्टूडेंट वीजा की अपील कर दिया। मगर मुसीबतों ने ब्रिगिट का साथ यहां भी नही छोड़ा और फिर अचानक से ब्रिगिट को बेल्जियम एम्बेसी द्वारा सूचित किया गया कि चूकि पाणिनी कन्या महाविद्यालय उनके अधिकृत महाविद्यालयों की सूची में पंजीकृत नहीं है लेहाजा उनके स्टूडेंट वीजा की अपील निरस्त की जाती है। यह सूचना ब्रिगिट के जीवन में एक भयावह तूफान जैसे आया जिसने ब्रिगिट को पूष्ठट-पूष्ठट कर रोने को विवश कर दिया। फिलहाल ब्रिगिट के सपने अधूरे रह गये, इस बनारस में रहकर अपनी चाहतों को पूरा करने का उसका अरमान टूट गया है। अब ऐसे में ब्रिगिट के सामने भारत छोड़कर जाने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा लेहाजा ब्रिगिट ने सरहदों के कानून का पालन करते हुए इस मुल्क को छोड़ दिया है। जाते-जाते ब्रिगिट ने अपनी मोहब्बत और उससे जुदाई की एक दर्दृ भरी दास्तां हमे लिख भेजा है। ब्रिगिट को इस बात का बेहद मलाल है कि वाराणसी के सम्पूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय ने उसके साथ जो व्यवहार किया वह उसे कभी नही भूलेगी। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी भावनाओं को समझा होता तो आज ब्रिगिट यहां की विद्यार्थी होती और इसी शहर में अपने सपनों को पूरा करती। बहरहाल अपने दिल में कुछ खट्टी तो कुछ मिठी यादों को लेकर ब्रिगिट सरहद के पार चली गयी लेकिन ब्रिगिट के साथ जो हुआ उसे जानकर इतना तो समझ में आता है कि बड़ी बे-आबरू होकर निकली इस मुल्क के सरहद से वो!।


धर्म के मार्ग पर चलना अक्सर दूसरों की अच्छाई और समर्थन पर निरंकार करता है। एक योगिनी और भक्त के रूप में वह वैदिक अनुष्ठानों, संस्कृत, मंत्र और धर्म शास्त्र में गहरी रुचि के साथ वाराणसी आईं। शुरूआत में उसने महसूस किया कि एक गैर ब्राह्मण और वेदों का अध्ययन करने वाली एक विदेशी महिला होने के कारण उसे यहां स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया समुदाय ने उसकी दिनचर्या को स्वीकार करना शुरू कर दिया और देखा कि कैसे वह भारतीय संस्कृति की आदी हो गयी। आज काशी को यहां मणिकर्णिका और पंचगंगा के बीच मंदिरों और घाटों पर उसकी१ उपस्थिति याद आ रही है, जहां वह रोज देखी जाती थी। अपनी खुद की यात्रा में आने वाली बाधाओं के बावजूद, वह अक्सर कलाकार, युवाओं और वयस्कों को अपने पथ का अनुसरण करने और अपने अच्छे कर्म को बनाए रखने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती थी।

वह काशी के बाहरी इलाके में छात्राओ के प्रसिद्ध गुरुकुल, पाणिनी कन्या महाविद्यालय में संस्कृत, हिंदी और धर्म शास्त्र का अध्ययन करने के लिए एक छात्र वीजा प्राप्त करने के उम्मीद के साथ यूरोप लौट गई। लेकिन विदेशियों के लिए मजबूत छात्र नियमों के कारण आज अपनी मंजिल की तरफ वह आगे नहीं बढ़ पाईं। उसे बीएचयू और सम्पूणार्नंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए बड़ी जलालत झेलनी पड़ी। इसके बाद आप्रवासियों ने गलत धारणाओं के कारण उसके वीजा को अस्वीकार कर दिया और अब भारत में उसके अध्ययन को आगे बढ़ाने के लिए अनिश्चित अवधि के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। वह अपनी पसंद के स्कूल पाणिनि कन्या महाविद्यालय में अपनी पढ़ाई शुरू करने के लिए जल्द ही लौटना पसंद करेगी लेकिन जानती है कि यह अब सं•ाव नहीं है। वर्तमान में हम नहीं जानते कि उसकी यात्रा कहां तक जाएगी और यदि वह जल्द ही वापस आएगी तो आप भी उसकी कला को देख सकते हैं ।





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