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सोमवार , 22 सिंतबर 16
क्रान्ति क्या है : भगत सिंह
true picture of bhagat singh



असेम्बली में बम फेंकने के बाद, 6 जून, सन् 1929 को दिल्ली के सेशन जज मि.लियोनाई मिडिल्टन की अदालत में दिये गये भगत सिंह के ऐतिहासिक बयान का एक अंश


भगत सिंह से दिल्ली के सेशन कोर्ट में जब पूछा गया कि क्रान्ति से क्या मतलब है?


          इस प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा था कि क्रान्ति के लिए खूनी लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।

          समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते है। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया-भर के बा़जारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने बच्चों के तन पर ढकने-भर को कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ़जरा-़जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।

          यह भयानक असमानता और जबर्दस्ती लादा गया भेद-भाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मँुह पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ो शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

          सभ्यता का यह प्रासाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जो साम्राज्यशाही के नाम से विख्यात है, समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छूटकारा मिलना असम्भव है, और तब तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शान्ति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातें महज ढोंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। क्रान्ति से हमारा मतलब अन्ततोगत्वा एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा और जिसके फलस्वरूप स्थापित होने वाला विश्व-संघ पीड़ित मानवता को पूँजीवाद के बन्धनों से और साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा।

          यह है हमारा आदर्श। और इसी आदर्श से प्रेरणा लेकर हमने एक सही तथा पुरजोर चेतावनी दी है। लेकिन अगर हमारी इस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया और शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आयी तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है। सभी बाधाओं को रौंदकर आगे बढ़ते हुए उस युद्ध के फलस्वरूप सर्वहारा वर्ग के अधिनायक तंत्र की स्थापना होगी। यह अधिनायक तंत्र क्रान्ति के आदर्शों की पूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा। क्रान्ति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है। इन आदर्शों के लिए और इस विश्वास के लिए हमें जो भी दण्ड दिया जाएगा, हम उसका सहर्ष स्वागत करेंगे। क्रान्ति की इस पूजा वेदी पर हम अपना यौवन नैवेद्य के रूप में लाये हैं,क्योंकि ऐसे महान आदर्श के लिए बड़े से बड़े त्याग भी कम है। हम सन्तुष्ट हैं और क्रान्ति के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं।

इन्कलाब जिन्दाबाद!
(भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज से)

भगत सिंह के आखिरी खत

Letter of bhagat singh
Letter of bhagat singh


          दिल दिल में गरीबों, मजदूरों, किसानों और बेसहाराओं के प्रति अगाध मुहब्बत रखने वाले वीरा की आँखों में आ़जाद भारत का सपना था। उसके अरमानों में वह भारत था जहाँ जाति और धर्म का झगड़ा न हो। वतनपरस्ती के लहु से सराबोर वीरा के पैरों में साम्राज्यवादी व्यवस्था को कुचलने की ताकत थी। वह अपने जीते जी तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंकने की क्षमता रखता था यही वजह थी कि साम्राज्यवादियों ने उसके इंकलाबी जीवन का जन्म होते ही उसे मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया।

          अपनी माँ के लाडले वीरा का जन्म २८ सितम्बर १९०७ को पंजाब के एक गांव लायलपुर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के हिस्से में पैâसलाबाद के नाम से जाना जाता है। अपनी माँ का वह लाडला बालक जब वीरा से भगत बना तो उसने अपनी बड़ी माँ ‘भारत' की आँखो में अश्क और बदन पर बेड़ियाँ देखीं। माता विद्यावती की कोख से जन्म लेने वाले वीरा ने जब माँ भारती के दर्द को करीब से देखा, तभी बेबस और लाचार माँ भारती के अश्कों से एक महान क्रान्तिकारी का जन्म हुआ जिसे सरदार भगत सिंह के नाम से पूरा देश जानता है, जिसकी कर्मठता,क्रान्ति और कुर्बानी का कायल आज भी इस देश का हर देशभक्त नौजवान है।

          एक दुखियारी माँ के आँसुआें से जन्मे उस क्रान्तिकारी ने अपनी मातृ भूमि के दर्द को इस देश के हर गरीबों,मजदूरों और किसानों की आँखों में देखा था। भगत सिंह ने इस देश के गाँवों में, गरीबो की बस्ती में और मजदूरों के घरों में खुशहाली वापस लाने का सपना देखा था। वह शोषित और पीड़ित लोगों को आ़जाद कराना चाहते थें। उन्हे समाज में बराबरी का दर्जा और उनका हक दिलाना चाहते थें। वो समाज में समानता स्थापित करना चाहते थें।

          मगर यह एक कड़वा सच है कि भगत सिंह की नि:स्वार्थ व अगाध देशभक्ति और बढ़ती लोकप्रियता उस दौर में किसी भी कांग्रेसी नेताओं को चुभती थी। यहाँ तक की महात्मा गांधी भी भगत सिंह की लोकप्रियता को स्वीकार नहीं कर पा रहे थें। बेशक उस समय इस देश में ब्रिटिश हुकूमत का शासन था मगर अपने देश के कुछ नेताआें में भी साम्राज्यवाद की भावना चरम पर थी। चूँकि गरीबों का दर्द समझने वाले भगत सिंह शुरु से ही साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ थें, वह न केवल अंग्रेजों की गुलामी से भारत को आ़जाद कराना चाहते थें बल्कि इस देश के हर एक आम आदमी की आ़जादी की बात करते थें। उनके सोच का भारत साम्राज्यवाद विहीन था। वो साम्राज्यवादी व्यवस्था की खिलाफत करते थें उन्होने ``साम्राज्यवाद मुर्दाबाद'' का नारा बुलन्द किया था। उनकी धमनियों में वतनपरस्ती का लहू बहता था।

          यह बात भारत के साम्राज्यवादी नेताओं को नागवार लगती थी यही वजह थी कि इस देश में साम्राज्यवादी ताकतों ने अंग्रेजों के साथ षड़यंत्र रचकर सरदार भगत सिंह के क्रान्तिकारी जीवन का जन्म होने के साथ ही उन्हे फांसी के तख्त तक पहुँचा दिया और महज २३ वर्ष ५ माह की युवावस्था में ही माँ भारती का वह बेटा उसके दर्द को दूर किये बिना इस दुनिया से रुखसत हो गया। जिसकी कमी आज भी इस देश के हर सच्चे देशभक्तों को खलती है, जिसकी जरूरत आज भी भारत के किसानों को, गरीबों को,मजदूरों को और बेरोजगार नौजवानों को महसूस होती है। निश्चित रूप से यदि भगत सिंह जिन्दा होते तो इस देश की तस्वीर कुछ और ही होती आज भी यहाँ साम्राज्यवादियों का बोलबाला न होता।

          भगत सिंह ने साम्राज्यवादी व्यवस्था की खिलाफत की थी। यदि भारत में आज साम्राज्यवादी व्यवस्था का अन्त हो चुका होता तो इस देश के शासकों द्वारा भगत सिंह के जीवन के संघर्षों का बखान किया जाता। उनकी जिन्दादिली की दास्तान इस देश में जरूर प्रचारित की जाती मगर इस देश की सरकार आज भी भगत सिंह के संघर्षों की गाथा को छुपाना चाहती है। सरकार नहीं चाहती की भगत सिंह के विचार जन-जन तक पहँुचे। सरकार को इस बात का भय है कि कहीं भगत सिंह के विचारों का प्रचार-प्रसार हो जाने से देश में पुन: साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ एक नई क्रांति की शुरुआत न हो जाए। यह बातें इस बात को प्रमाणित करती है कि आज भी इस देश में साम्राज्यवादी व्यवस्था कायम है बल्कि सीधे शब्दों में यह कहा जाय कि भारत में आज भी साम्राज्यवादी सरकार का शासन चल रहा है तो गलत नहीं होगा।