वाराणसी (रणभेरी): पवित्र माह रमजान की 21 तारीख को शिया समुदाय ने हजरत इमाम अली की शहादत की याद में दोषीपुरा क्षेत्र से तुर्बत का जुलूस निकाला। अलम और ताबूत के साथ निकले इस जुलूस में बड़ी संख्या में अजादार शामिल हुए। पूरे रास्ते “या अली” की सदाओं और नौहाख्वानी के बीच मातमी माहौल बना रहा, जहां लोगों ने सीनाजनी कर अपने गम का इजहार किया।
जुलूस शुरू होने से पहले आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना ने हजरत इमाम अली की शहादत का मार्मिक वाकया बयान किया। उन्होंने बताया कि 40 हिजरी की 19 रमजान की सुबह इराक के कूफा शहर की मस्जिद में फज्र की नमाज के दौरान सजदे की हालत में इमाम अली पर हमला किया गया था। जहर में बुझी तलवार से किए गए इस वार के बाद 21 रमजान को उनकी शहादत हुई। शिया समुदाय हर वर्ष 19 से 21 रमजान तक इन दिनों को गम और अकीदत के साथ याद करता है।
मौलाना ने अपने संबोधन में यह भी बताया कि इमाम अली नमाज के लिए मस्जिद पहुंचे तो उनका हमलावर वहीं मौजूद था। इमाम अली ने उसे नमाज के लिए उठाया, लेकिन उसी ने सजदे की अवस्था में उन पर हमला कर दिया। इसके बावजूद इमाम अली ने अपने हमलावर के साथ इंसाफ और रहम का व्यवहार करने की सीख दी, जो पूरी इंसानियत के लिए मिसाल है।
मजलिस के बाद अंजुमन जाफरिया दोषीपुरा बनारस की ओर से नौहाख्वानी और मातम किया गया। अजादारों ने दर्द भरे नौहे पढ़ते हुए इमाम अली की शहादत को याद किया।
इसके बाद अलम और ताबूत के साथ तुर्बत का जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से गुजरता हुआ आगे बढ़ा। जुलूस दोषीपुरा, काजीपुरा, बड़ी बाजार, कमलापुरा, छः मोहानी, धनेसरा और हनुमान फाटक चौकी से होकर सरैया स्थित कर्बला इमामबारगाह पहुंचा, जहां इसका समापन हुआ।
इस अवसर पर हुसैनी हाउस सहित अन्य स्थानों पर भी मजलिस का आयोजन किया गया, जहां उलेमा ने इमाम अली की शहादत और उनके आदर्शों पर रोशनी डाली। मजलिस के बाद तुर्बत उठाई गई और अजादारों ने मातम कर अपनी अकीदत और गम का इजहार किया।
