गणतंत्र दिवस परेड से हटेगा वीआईपी कल्चर, कुर्सियों पर अब नहीं दिखेंगे ‘VVIP’ और ‘VIP’

गणतंत्र दिवस परेड से हटेगा वीआईपी कल्चर, कुर्सियों पर अब नहीं दिखेंगे ‘VVIP’ और ‘VIP’

(रणभेरी): केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस समारोह में वर्षों से चली आ रही वीआईपी संस्कृति को खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इस बार परेड देखने आने वाले अतिथियों की कुर्सियों पर न तो ‘VVIP’, ‘VIP’ और न ही ‘डिग्निटी’ जैसे टैग नजर आएंगे। इनके स्थान पर भारत की नदियों के नाम लिखे जाएंगे। वहीं, बीटिंग रिट्रीट समारोह की गैलरियों को संगीत वाद्ययंत्रों के नाम दिए गए हैं।

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शुक्रवार को इसकी जानकारी देते हुए बताया कि सरकार का उद्देश्य आम नागरिक और विशेष अतिथि के बीच की औपचारिक दीवार को कम करना है। उनका कहना है कि यह बदलाव भारतीय संस्कृति, विरासत और समानता की भावना को मजबूती देगा तथा हर नागरिक को समान सम्मान का अनुभव कराएगा।

सरकार के मुताबिक, प्रतीकात्मक रूप से यह कदम यह संदेश देगा कि गणतंत्र दिवस केवल विशिष्ट वर्ग का नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक का पर्व है।

यूरोपीय संघ के शीर्ष नेता होंगे 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि

26 जनवरी को होने वाले 77वें गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। विदेश मंत्रालय ने बताया कि भारत और यूरोपीय संघ वर्ष 2004 से रणनीतिक साझेदार हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों नेताओं को समारोह में आमंत्रित किया है। इसके बाद 27 जनवरी को नई दिल्ली में होने वाले 16वें भारत–ईयू शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी ये दोनों नेता करेंगे। माना जा रहा है कि इस दौरे से व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आपसी सहयोग को नई दिशा मिलेगी।

कैसे तय होता है गणतंत्र दिवस का मुख्य अतिथि

भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह (1950) में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो पहले मुख्य अतिथि बने थे। इसके बाद से यह परंपरा कूटनीतिक प्राथमिकताओं से जुड़ गई। अब तक यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस के नेताओं को सबसे अधिक पांच-पांच बार-मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, मुख्य अतिथि का चयन करते समय भारत की विदेश नीति, भविष्य की व्यापारिक संभावनाएं, रक्षा सहयोग और वैज्ञानिक साझेदारी जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है। यह भी देखा जाता है कि किस देश के साथ आने वाले वर्षों में रणनीतिक संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है।

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