वाराणसी (रणभेरी): धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में ऐतिहासिक नाटी इमली भरत मिलाप लीला को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। 22 अक्टूबर को आयोजित होने वाली इस विश्वप्रसिद्ध लीला में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मिलन का साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जुटने की उम्मीद है। करीब 488 साल पुरानी यह परंपरा काशी की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।
इस बार तिथियों के फेर के चलते भरत मिलाप का आयोजन परंपरागत तारीख से अलग हो रहा है। आयोजकों के मुताबिक, पहली बार विजयादशमी के अगले दिन के बजाय एकादशी तिथि पर इस ऐतिहासिक लीला का आयोजन किया जा रहा है।
एकादशी तिथि के कारण बदली आयोजन की तारीख
श्रीचित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि नाटी इमली की भरत मिलाप लीला आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी को आयोजित की जाती है। काशी के पंचांगों के अनुसार, इस वर्ष एकादशी तिथि 22 अक्टूबर को पड़ रही है। इसी वजह से इस बार आयोजन की तारीख में बदलाव किया गया है।
यदुवंशियों के कंधों पर सवार होकर आते हैं भगवान श्रीराम
नाटी इमली की भरत मिलाप लीला की सबसे विशिष्ट परंपरा यदुवंशियों की भागीदारी है। धोती-बनियान पहने, सिर पर पगड़ी और आंखों में सुरमा लगाए यादव बंधु भगवान श्रीराम के पुष्पक विमान को अपने कंधों पर उठाकर लीला स्थल तक लाते हैं।
करीब पांच टन वजनी पुष्पक विमान को कंधों पर उठाकर ले जाने का यह दृश्य श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहता है। काशी की इस अनूठी परंपरा को लोकभाषा में इस भाव के साथ याद किया जाता है कि यदुकुल के कंधों पर रघुकुल का रथ सवार होता है। यह परंपरा विभिन्न समुदायों की सहभागिता और आपसी सौहार्द का संदेश भी देती है।
शाम 4:40 बजे होगा चारों भाइयों का भावुक मिलन
भरत मिलाप लीला का सबसे भावुक और प्रतीक्षित क्षण शाम करीब 4:40 बजे आता है। निर्धारित स्थान पर अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें पड़ते ही कुछ मिनटों के लिए पूरा वातावरण भक्ति और भावनाओं से सराबोर हो जाता है।
मान्यता के अनुसार, वनवास पूरा कर भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के लौटने पर भरत और शत्रुघ्न अपने भाइयों के स्वागत में जमीन पर लेट जाते हैं। वहीं, श्रीराम और लक्ष्मण अपने भाइयों की ओर दौड़ पड़ते हैं। चारों भाइयों का मिलन होते ही पूरा मैदान ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गूंज उठता है। इस दृश्य को देखने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
काशी राज परिवार की भागीदारी भी परंपरा का हिस्सा
नाटी इमली की भरत मिलाप लीला में काशी राज परिवार की भागीदारी भी लंबे समय से परंपरा का हिस्सा रही है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पूर्व काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने वर्ष 1796 में पहली बार इस आयोजन में शाही अंदाज में भाग लिया था। इसके बाद राज परिवार की पीढ़ियां इस परंपरा का निर्वहन करती आ रही हैं।
