खुला राज ! जुआरियों का पासकोड है PDA

खुला राज ! जुआरियों का पासकोड है PDA

पुल्लू, दीपक, अन्नू – तीन नाम, एक कथित जुआ नेटवर्क?

  • ‘PDA’ कोड बताने पर जुआरियों के रूपये से भरे बैग की तलाशी नहीं होती
  • आदमपुर में जुए के कथित कारोबार से जुड़ा कोड चर्चा में
  • लाखों-करोड़ों के खेल और पुलिस संरक्षण के आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग

वाराणसी (रणभेरी): कल तक दबी जुबान चर्चा में रहा ‘PDA’ अब इस खोजी पड़ताल का सबसे बड़ा सवाल है। सूत्रों के दावे के मुताबिक, यह किसी सरकारी योजना का नाम नहीं, बल्कि तीन कथित जुआ संचालकों के नाम के शुरुआती अक्षरों से बना कोड है- पुल्लू यादव, दीपक यादव और अन्नू यादव। दावा है कि इन्हीं नामों को जोड़कर ‘PDA’ शब्द प्रचलित हुआ। हालांकि, इस पहचान और कथित नेटवर्क में तीनों की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।

रणभेरी की पहली कड़ी में आदमपुर थाना क्षेत्र में जुआ संचालन, बड़े बुकरों की भूमिका, आठ-आठ घंटे की पालियों और हर दांव पर कथित वसूली के सवाल उठाए गए थे। बताते चले कि वाराणसी में आदमपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत मुकीमगंज, प्रहलाद घाट, घसियारी टोला, मच्छोदरी सहित अनेक मुहल्लों में धड़ल्ले से जुआ का संचालन हो रहा है।

सूत्र बताते हैं कि बड़े पैमाने पर संचालित होने वाले जुए के इस खेल के लिए कोइ एक स्थान फिक्स नही है। जुआ सञ्चालन के शातिर साझेदार पुल्लू यादव, दीपक यादव और अन्नू यादव ने क्षेत्र में दर्जनों मकान किराए पर ले रखा है जहां जुआरियों को पूरी व्यवस्था दी जाती है। यह भी बताया जा रहा कि जिन जिन मकानों में यह खेल अलग अलग शिफ्ट में होता है उसकी पूरी लिस्ट आदमपुर पुलिस के पास भी उपलब्ध है जिसके आधार पर सम्बंधित चौकी के सिपाहियों से जुआरियों को बैकिंग की जाती है।

अब दूसरी कड़ी में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि ‘PDA’ का इस्तेमाल वास्तव में किस संदर्भ में होता है और क्या इस कथित कोड के पीछे कोई संगठित व्यवस्था काम कर रही है?

कोड बताने पर बैग की तलाशी नहीं होने का दावा, कितना सच?

सूत्रों ने दावा किया है कि जुए के कथित खेल से लौटते समय नकदी लेकर चलने वाले कुछ लोगों के बीच ‘PDA’ नाम का इस्तेमाल किया जाता है। यह भी आरोप लगाया गया है कि इस नाम का उल्लेख करने पर कथित तौर पर बैग की तलाशी नहीं होती। यदि ऐसा कोई व्यवहार वास्तव में होता है, तो इसकी जांच जरूरी है। क्या किसी जांच, शिकायत, प्रत्यक्षदर्शी के बयान या अन्य साक्ष्य से इस दावे की पुष्टि होती है? क्या किसी व्यक्ति को किसी विशेष नाम या संपर्क के आधार पर अनुचित लाभ मिलता है? इन सवालों का उत्तर स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकता है।

बुकरों की महफिल, बड़ी रकम और आठ-आठ घंटे की कथित पालियां

पहली कड़ी में सामने आई जानकारी के मुताबिक, कथित जुआ सत्रों में बुकर बड़ी रकम लेकर बैठते हैं और अनेक खिलाड़ी सीधे उनके साथ दांव लगाते हैं। यह भी दावा किया गया कि संचालन की जिम्मेदारियां तीन पालियों में बांटी गई हैं और हर दांव पर व्यवस्था के नाम पर रकम वसूली जाती है। इन दावों की पुष्टि के लिए वित्तीय रिकॉर्ड, विश्वसनीय गवाहों और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी है।

पुलिस संरक्षण के आरोपों पर जवाबदेही किसकी?

इस मामले में स्थानीय पुलिस की कथित हिस्सेदारी और संरक्षण के आरोप सबसे गंभीर हैं। यदि किसी पुलिसकर्मी द्वारा अवैध जुआ संचालन को संरक्षण देने या उसके बदले धन लेने के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन को चाहिए कि वे शिकायतों, पूर्व कार्रवाई और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष समीक्षा कराएं।

काशी के युवाओं और परिवारों की बर्बादी का सवाल

जुए की लत से बचत खत्म होने, कर्ज बढ़ने, पारिवारिक विवाद और मानसिक संकट जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। यदि वाराणसी में अवैध जुआ संचालन बड़े पैमाने पर हो रहा है, तो उसका असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। युवाओं और प्रभावित परिवारों की सुरक्षा के लिए कार्रवाई के साथ जागरूकता, परामर्श और सहायता की व्यवस्था भी जरूरी है।

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