“मैदान नहीं, हौसला है…”और वही आज सबसे बड़ा सवाल बन गया

"मैदान नहीं, हौसला है…"और वही आज सबसे बड़ा सवाल बन गया

नंगे पांव दौड़ते सपनों ने संसद तक आवाज़ पहुंचा दी

मैदान नहीं, हौसले की जीत- जंसा के 300 गरीब खिलाड़ियों की पुकार “खेलने की जगह दो, हम देश के लिए पदक लाएँगे”

वाराणसी (रणभेर संवाददाता): ग्रामीण भारत की मिट्टी से उठते सपनों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी प्रतिभा को रोक नहीं सकती।बस दिशा और सहारा चाहिए। जंसा बाजार, वाराणसी स्थित सम्राट स्पोर्ट्स फाउंडेशन के तत्वावधान में संचालित निःशुल्क सम्राट स्पोर्ट्स एकेडमी से जुड़े करीब 300 बालक-बालिकाओं ने अपने भविष्य के लिए खेल का मैदान मांगा है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले इन बच्चों के पास जूते-ट्रैक नहीं, लेकिन आंखों में देश के लिए खेलने का सपना है।

बीती शाम संस्था द्वारा जंसा बाजार से गुजर रही आप सांसद संजय सिंह की पदयात्रा का जोरदार एवं भव्य स्वागत किया गया। बच्चों ने अपने संघर्ष, अभ्यास और सपनों की बात सीधे जनप्रतिनिधि तक पहुँचाई, एक ही स्वर में मांग उठी:
“मैदान दीजिए, मेहनत हम करेंगे।”

"मैदान नहीं, हौसला है…"और वही आज सबसे बड़ा सवाल बन गया

बीती शाम वाराणसी के जंसा बाजार पहुंचने पर सांसद संजय सिंह का सम्राट स्पोर्ट्स फाउंडेशन के सैकड़ो बच्चों ने किया जोरदार स्वागत।

सम्राट स्पोर्ट्स फाउंडेशन के संस्थापक/अध्यक्ष अजीत मौर्या ने बताया कि संस्था पूर्णतः निःशुल्क, गैर-लाभकारी और सामाजिक सेवा के उद्देश्य से कार्य कर रही है। ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को खेल प्रशिक्षण, अनुशासन, स्वास्थ्य और फिटनेस की शिक्षा दी जाती है ताकि वे राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकें।

सबसे प्रेरक पहलू यह है कि मैदान न होने के बावजूद, जंसा के एक निजी लॉन में निजी संसाधनों से कोच अजीत मौर्या नियमित रूप से इन बच्चों को निःशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। सीमित साधनों में पसीना बहाते ये बच्चे सुबह-शाम अभ्यास करते हैं कभी धूप, कभी ठंड, कभी खाली मैदान के बिना रह जाते हैं पर जज़्बा अडिग है।

संस्था के पदाधिकारियों ने बताया कि अभिभावकों और ग्रामीणों का सहयोग ही इन बच्चों की ताकत है। यदि स्थायी खेल मैदान उपलब्ध हो जाए, तो यही बच्चे वाराणसी का नाम प्रदेश और देश में रोशन कर सकते हैं।

आज जंसा के इन 300 बच्चों की आवाज़ केवल एक मांग नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन के लिए एक चुनौती है—
“बच्चों को मैदान दो… खेल का मैदान दो!”

यह कोई नारा नहीं, जंसा के सैकड़ो सपनों की सामूहिक पुकार है।
जब नंगे पांव मेहनत की मिट्टी में दौड़ते बच्चों ने आप सांसद के सामने अपनी बात रखी,
तो संजय सिंह भी भावुक हो उठे।
बच्चों की आंखों में भविष्य देखा, पसीने में संघर्ष पहचाना
और फिर खुद बच्चों के साथ बच्चों के बीच बैठकर आवाज़ बुलंद की
“बच्चों को मैदान दो, खेल का मैदान दो!”
सांसद संजय सिंह ने भरोसे की जुबान में वादा किया कि
देश के भविष्य इन होनहार बच्चों के विकास और खेल के मैदान के लिए हर संभव सहयोग किया जाएगा।
यह पल सिर्फ़ एक आश्वासन का नहीं था, बल्कि उन बच्चों के लिए उम्मीद की पहली रेखा थी
जिनके पास संसाधन नहीं, पर देश के लिए खेलने का हौसला है।
आज जंसा के बच्चे सिर्फ़ नंगे पांव मिट्टी में पसीना नहीं बहा रहे बल्कि वे सिस्टम की चुप्पी को चुनौती दे रहे हैं।

क्या प्रतिभा को आगे बढ़ने के लिए मैदान मिलेगा, या सपने यूं ही मिट्टी में दौड़ते दौड़ते रेंगने लगेंगे ? ये खबर खेल की नहीं, न्याय की है। ये मांग सुविधा की नहीं, मौके की है। मैदान मिला तो पदक आयेंगे, वरना इतिहास पूछेगा, हमने समय रहते क्यों नहीं सुना?

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