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शनिवार 15-सितम्बर -18




वाराणसी। जमीनों के हेराफेरी के मामले में भारतीय न्याय व्यवस्था इतनी लचर और झोलदार है कि वादों विवादों के निस्तारण में इतना समय लग जाता है कि आये दिन जमीनों,समितियों ट्रस्टों के सम्पतियों के खरीद फरोख्त में धोखाधड़ी के मामले न्यायालयों में बढ़ते ही जा रहे हैं।

ऐसे मसले यूं ही नहीं अदालतों में लटकते रहते हैं, बल्कि देखा जाए तो इन मामलों को लालच दबाव राजस्व कर्मियों प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से धोखेबाज़ किस्म के व्यक्ति या तो अपने पक्ष में करा लेते हैं, या मामले को उलझाए रहते हैं ।

कहना गलत न होगा कि 'जब बेईमानों का पैसा बोलता है, तो राजस्वकर्मियों का ईमान डोलता है।
ऐसा ही एक मामला जिले के मौजा-भेलखा परगना- अठगावां तहसील -पिंडरा का है, जहां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं मदन मोहन मालवीय जी ने १९४१ गोरक्षा मंडल की स्थापना की थी गौ सेवा गौरक्षा के प्रति मालवीय जी की आस्था देखकर १९४२ में गिफ्ट डीड के माध्यम से रघुनाथ दत्त ब्यास ने लगभग इकतालीस (४१) एकड़ जमीन मालवीय जी द्वारा स्थापित भारतीय गौरक्षा प्रचार मण्डल को दान कर दिया था।

भारतीय गौरक्षा प्रचार मण्डल को दान कर दिया था।
संस्था का उद्देश्य यह था कि इस जमीन पर गौसम्पदा का संरक्षण किया जाएगा।
संस्था कि जमीनों के हो रहे गोलमाल बंदरबांट वाले सभी पहलुओं से रूबरू होने के लिए चलते हैं आज से पांच दशक पूर्व - स्थानीयों लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मालवीय जी के संस्था भारतीय गोरक्षा मण्डल को जमीन दान करने वाले पं० रघुनाथ दत्त व्यास कथावाचक थें, गावँ-गिराव जमींदारों जजमानों से कथावाचन से मिले धन से च्यवन आश्रम के लिए जमीन संग्रह करते रहे कुछ जमीने इन्हें दान में भी मिली थीं। बाद में जब पं० मदन मोहन मालवीय जी गोरक्षा मण्डल की स्थापना कियें तो रघुनाथ दत्त व्यास ने इन जमीनों को दान कर दियें।




फिर हुआ क्या-भारतीय गोरक्षा मण्डल के १९४६ सन तक मालवीय जी संस्थापक /अध्यक्ष रहें बाद में इनके मृत्यु के बाद से सन १९७० तक इस संस्था के अध्यक्ष दानकर्ता रघुनाथ दत्त व्यास रहें। चेला कर गया खेला - पांच दशक पूर्व जब रघुनाथ दत्त की मृत्यु हो गयी तो इनके स्थान पर इनके चेले श्यामदास भारतीय गोरक्षा मण्डल संस्था के अध्यक्ष बन गए, संस्था की कमान सम्भालते ही संस्था की जमीनो की बिक्री का खेला शुरू हो गया।

संस्था के जमीन की पहली हेराफेरी-भारतीय गो रक्षा मण्डल का अध्यक्ष बनते ही श्यामदास ने सबसे पहला कार्य यह किया कि कूट रचित दस्तावेज प्रस्तुत कर संस्था की जमीन अपने नाम करा लिया, और समस्त जमीन के एक तन्हा मालिक दर्शाते हुए नौ एकड़ जमीन १०-१०-१९८४ को आशुतोष सहकारी आवास समिति लि० जरिये सचिव अच्युतानंद पाण्डेय को एक लाख आठ हजार रुपये में बेच दिया।

जबकि यह होता रहा है कि नियमानुसार किसी भी ट्रस्ट संस्था की जमीन किसी के व्यक्तिगत नाम से दर्ज नही की जा सकती भले ही वह व्यक्ति उस ट्रस्ट का अध्यक्ष क्यों न हो मगर नियमों-नीतियों को धता बताते हुए श्यामदास ने ट्रस्ट की जमीन स्वयं के नाम करवाते हुए इसे विक्रय कर दिया।

जब कब्जा दखल में हुआ सहकारी समिति को लगा झोल तो उस समय जमीन के हेराफेरी की खुली पोल-महामना मालवीय जी उस समय कहीं आने जाने के लिए बग्घी (घोड़ागाड़ी) का प्रयोग करते थे।



उस दौरान मालवीय जी की बग्घी चलाने वाले व्यासबाग हरहुआ के बीपत पुत्र घुरविल को खाता संख्या(१३५६ फसली) पांच बीघा जमीन इस उद्देश्य से दिए थे कि इसी जमीन को जोत बोकर बीपत अपने परिवार की परवरिश करेंगे।
बीपत के मृत्यु के पश्चात तब से लगातार इस जमीन पर बीपत के पुत्र कन्हैया काबिज चले आते रहे जब श्यामदास ने आशुतोष सहकारी आवास समिति को भारतीय गौरक्षा मण्डल की नौ एकड़ जमीन बेची तो उसमें बीपत को मालवीय जी द्वारा जीवन यापन को दी गयी पांच बीघा जमीन भी श्यामदास ने बेच दी । लिहाजा अन्य जगहों पर काबिज़ होने के बाद जब आशुतोष सहकारी आवास समिति के पदाधिकारियों ने बीपत के पुत्र कन्हैया पर बेदखली के लिए सन १९८८ में न्यायालय मुंसफ हवाली (संख्या ८७७/१९८८) मुकदमा कर दिया, मालवीय जी द्वारा स्थापित गौसम्पदा सेवा के मिली भूमि को बिकते और जीवन यापन में मिली जमीन को हाथों से सरकता देख अवाक कन्हैया ने मुकदमे की पैरवी के लिए पावरलूम चला जीवन यापन कर रहे अपने बड़े पुत्र शिवप्रसाद को सौंप दी ।



शिवप्रसाद का कहना यह है कि यह मालवीय जी के ट्रस्ट भारतीय गोरक्षा मण्डल की सम्पत्ति है इसे कैसे बेचा जा सकता है । १९८९ में और उसके बाद भी कई बार हमारे पक्ष में फैसला आया मगर नतीजा आज भी शून्य है, मेरा यह कहना है कि जब भारतीय गोरक्षा मण्डल निष्क्रिय है और वर्तमान में इस संस्था का कोई सदस्य नही तो सरकार को यह सम्पति कब्जे में ले लेनी चाहिए, मगर हर जगह गुहार लगाने के बाद भी हमें निराशा हाथ लग रही है। फिलहाल सभी पहलुओं पर गौर किया जाए तो बात छनकर यही आया की राजस्व कर्मियों के मिलीभगत प्रशासनिक लापरवाही कानून के लाचारी का लाभ उठा धोखबाज़ टाइप के व्यक्ति भारतीय गोरक्षा मण्डल ट्रस्ट की सम्पति बेचते जा रहे हैं और शासन प्रशासन मौन है। अगले अंक में हम बताएंगे शिवदास ने जमीन बचाने के लिए कहां कहां गुहार लगाई किसने क्या कहा क्या कार्यवाही हुई ,कैसे एक फर्जी संस्था बना वर्तमान में कौन बेच रहा जमीन।


...अमित मौर्या की रिपोर्ट