(रणभेरी): देशभर में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को लेकर जनरल कैटेगरी के छात्रों और सवर्ण समाज में नाराज़गी बढ़ती जा रही है। कई विश्वविद्यालय परिसरों में इसका खुला विरोध शुरू हो गया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में शिक्षकों और छात्रों ने इन नियमों को “काला कानून” बताते हुए आपत्ति जताई है। इसी बीच एक छात्र ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया है।
याचिकाकर्ता छात्र हिमांशु राज का कहना है कि UGC के नए प्रावधानों में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों की जांच के लिए प्रस्तावित समिति में केवल SC, ST, OBC और दिव्यांग वर्ग के प्रोफेसरों को शामिल करने की व्यवस्था की गई है। ऐसे में जनरल वर्ग का कोई प्रतिनिधि नहीं रहेगा, जिससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना है कि जब समिति में उनका प्रतिनिधित्व ही नहीं होगा, तो उनकी शिकायतों को कौन सुनेगा?
हिमांशु राज ने दूसरी बड़ी कमी की ओर इशारा करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत करता है और जांच में वह गलत साबित होती है, तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की सजा या दंड का प्रावधान नहीं रखा गया है। छात्रों का मानना है कि बिना जवाबदेही के यह व्यवस्था न्याय के बजाय उत्पीड़न का माध्यम बन सकती है। उन्होंने मांग की कि गलत शिकायत करने वालों पर भी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
छात्रों का कहना है कि भेदभाव को केवल जाति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। अन्याय किसी भी छात्र के साथ हो सकता है और शोषण करने वाला भी कोई भी हो सकता है, इसलिए नियम सभी के लिए समान और संतुलित होने चाहिए।
इस मुद्दे पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द, समानता और आपसी सम्मान बनाए रखना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि ABVP हमेशा से सामाजिक समरसता के पक्ष में रही है और किसी भी तरह के भेदभाव के लिए कैंपस में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
डॉ. सोलंकी ने यह भी कहा कि UGC के इस विनियम को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। ऐसे में UGC को सभी हितधारकों से संवाद कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि गलतफहमियों को दूर किया जा सके और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके।
वहीं, NSUI ने भी इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि NSUI जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने की पहल का स्वागत करती है, लेकिन समिति की संरचना और कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित समिति में SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों के साथ-साथ इन्हीं वर्गों से आने वाले शिक्षकों की भागीदारी भी अनिवार्य होनी चाहिए।
NSUI ने यह सुझाव भी दिया कि समिति की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इसमें सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल किया जाना चाहिए। संगठन ने सवाल उठाया कि समिति का अध्यक्ष कौन होगा, इस पर UGC की चुप्पी चिंता का विषय है। अगर समिति पूरी तरह विश्वविद्यालय प्रशासन के नियंत्रण में रही, तो वह केवल औपचारिक संस्था बनकर रह जाएगी।
NSUI ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले लैंगिक भेदभाव से जुड़ी कई समितियां बनाई गईं, लेकिन वे शिकायतों के प्रभावी निस्तारण में विफल रहीं। NFS और आरक्षण नीतियों के सही ढंग से लागू न होने के कारण आज भी दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षण पदों में बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं।
IIT, IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं और बढ़ती ड्रॉपआउट दर इस बात का संकेत हैं कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में गहरे सुधार की जरूरत है। हर तरह के भेदभाव के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज़ उठाना समय की मांग है।
गौरतलब है कि UGC ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स रेगुलेशन्स, 2026’ को अधिसूचित किया था। इसके तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और निगरानी तंत्र बनाने के निर्देश दिए गए हैं। ये व्यवस्थाएं मुख्य रूप से SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों पर केंद्रित होंगी।
सरकार का दावा है कि यह कदम उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। हालांकि, जनरल कैटेगरी के छात्रों का आरोप है कि इन नियमों से उन्हें “स्वाभाविक अपराधी” के रूप में देखा जा रहा है। उनका कहना है कि इससे कैंपस में तनाव और अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है।
