पाक महीना शुरू, मस्जिदों में तरावीह और घरों में इफ्तार की रौनक
वाराणसी (रणभेरी) : इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र महीने ‘रमजान’ की शुरुआत के साथ ही शहर में रौनक और रूहानियत का माहौल नजर आने लगा है। मस्जिदों में विशेष नमाज़ों का सिलसिला शुरू हो गया है और घर-घर में सहरी व इफ्तार की तैयारियां की जा रही हैं।
शहर के प्रसिद्ध बुनकर और सामाजिक कार्यकर्ता तुफैल अंसारी ने रमजान की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह महीना केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सब्र और खुदा के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। उनके अनुसार रमजान इंसान को भीतर से मजबूत बनाता है और उसे दूसरों के दर्द को समझने की तालीम देता है।

दो अहम पड़ाव: सहरी और इफ्तार
रोज़े की प्रक्रिया दो प्रमुख चरणों में पूरी होती है। सहरी के दौरान फज्र की नमाज़ से पहले भोजन किया जाता है। इसके बाद दिनभर अन्न-जल का त्याग कर रोज़ा रखा जाता है। इफ्तार सूर्यास्त के समय किया जाता है। शहर में इन दिनों शाम होते ही मस्जिदों और घरों में इफ्तार की रौनक देखने को मिल रही है।

खजूर से रोज़ा खोलने की परंपरा
तुफैल अंसारी ने बताया कि खजूर से रोज़ा खोलना ‘सुन्नत’ माना जाता है। इफ्तार में खजूर और पानी के साथ चना, मटर, छोले, घुघनी जैसे पारंपरिक व्यंजन शामिल किए जाते हैं। पहले जहां खजूर मिलना मुश्किल होता था, वहीं अब यह हर घर में आसानी से उपलब्ध है और इफ्तार का अहम हिस्सा बन चुका है।


तरावीह की विशेष नमाज़- रमजान की रातों में ‘तरावीह’ की विशेष नमाज़ अदा की जाती है, जिसमें कुरान शरीफ का पाठ होता है। मस्जिदों में देर रात तक इबादत का सिलसिला चलता है।
तुफैल अंसारी का कहना है कि रोज़े का असली मकसद इंसान के भीतर इंसानियत जगाना है। “रोज़ा केवल खाने-पीने का नाम नहीं, बल्कि पूरे दिन संयम में रहकर शाम को इबादत के साथ इफ्तार करने का एक रूहानी अनुभव है।” रमजान का यह पाक महीना शहर में भाईचारे, सहिष्णुता और आध्यात्मिक ऊर्जा का संदेश दे रहा है।
