- 20 दिन का अल्टीमेटम पूरा, पूछा – विरक्त वेतनभोगी कैसे हो सकता ?
- बोले शंकराचार्य – धर्म की शपथ के बाद दूसरी शपथ क्यों ? गोदान टैक्स फ्री से नहीं होगी गौ रक्षा
वाराणसी (रणभेरी): शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 20 दिन का अल्टीमेटम पूरा होने पर गुरुवार को काशी स्थित अपने मठ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर प्रदेश सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने योगी आदित्यनाथ के कालनेमि वाले बयान का हवाला देते हुए कहा कि जब मुख्यमंत्री ने कहा कि समाज में कुछ कालनेमि घुस आए हैं और यह स्पष्ट नहीं किया कि वे कौन हैं, तो हमने पहचान की शुरुआत उन्हीं से की।
उन्होंने सवाल दागा कि क्या योगी असली हिंदू हैं या फिर वेशधारी और ढोंगी आचरण वाले ? शंकराचार्य ने कहा कि जो व्यक्ति विरक्त हो जाता है, वह धर्म की शपथ लेकर कोई दूसरी शपथ स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने विरक्त की शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और वेतनभोगी बन गए। उन्होंने इसे शास्त्र और सनातन परंपरा के विरुद्ध बताते हुए कहा कि यह सिद्धांत का प्रश्न है, व्यक्तिगत नहीं। उन्होंने दो टूक पूछा कि क्या कोई गेरुआ वस्त्र पहनकर मांसाहारी हो सकता है ? क्या कोई विरक्त संत वेतनभोगी हो सकता है ?
देशभर के धर्माचार्यों से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई संत मुख्यमंत्री के साथ खड़ा होना चाहता है तो उन्हें आपत्ति नहीं, लेकिन शास्त्र और परंपरा से समझौता स्वीकार नहीं होगा। 10 दिन में उत्तर न मिलने पर इसे अधर्म का समर्थन माना जाएगा।
‘गोदान’ टैक्स फ्री से नहीं होगी गौ रक्षा
शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि 10 दिन के भीतर गौ माता की रक्षा के नाम पर सिर्फ दो कदम उठाए गए। उन्होंने सवाल किया कि क्या “एक ‘गोदान’ नाम की फिल्म रिलीज कर उसे टैक्स फ्री कर दिया गया। क्या इससे गौ माता की रक्षा हो जाएगी?” दूसरा कदम जिलाधिकारियों को गौशालाओं की स्थिति सुधारने का संदेश भेजना बताया गया, जिसे उन्होंने अप्रभावी करार दिया। संदेश भेज देने से व्यवस्था नहीं सुधरती। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने विधानसभा में खड़े होकर झूठ बोला और धर्म की शपथ संबंधी मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज किया।
मौनी अमावस्या से शुरू हुआ विवाद
विवाद की जड़ 18 जनवरी को माघ मेला के दौरान मौनी अमावस्या की घटना में है। शंकराचार्य पालकी से संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें रोककर पैदल जाने को कहा। शिष्यों के विरोध पर धक्का-मुक्की हुई और कई को हिरासत में लिया गया। आरोप है कि एक साधु को चौकी में पीटा गया। पालकी को संगम से करीब एक किलोमीटर दूर ले जाया गया और उसका हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। शंकराचार्य स्नान नहीं कर सके और 28 जनवरी तक अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठे रहे। बाद में वे वाराणसी लौट आए। इस घटनाक्रम के बाद धार्मिक और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई।
सरकार का जवाब – कोई कानून से ऊपर नहीं
विवाद पर विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं लिख सकता। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है, मैं भी नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि माघ मेले में जो मुद्दा नहीं था, उसे जानबूझकर मुद्दा बनाया गया। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने प्रयागराज में बयान दिया था कि यदि किसी संत का अपमान हुआ है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, वे स्वयं शंकराचार्य से मिलने नहीं पहुंचे।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि प्रदेश में एक व्यवस्था और सिस्टम है, जिसके तहत ही सबको काम करना होगा। काशी से उठी यह बहस अब प्रदेश की राजनीति और धर्माचार्यों के बीच गंभीर विमर्श का विषय बन गई है। शंकराचार्य ने साफ किया कि उनका सवाल किसी व्यक्ति विशेष से अधिक सिद्धांतों और परंपराओं से जुड़ा है। यदि उत्तर नहीं दिया गया तो हम मानेंगे कि आप अधर्मी आचरण का समर्थन कर रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री या सरकार की ओर से इस चुनौती का क्या जवाब आता है—और क्या यह टकराव आगे और तीखा रूप लेता है।
