वाराणसी (रणभेरी): Banaras Hindu University के वैदिक विज्ञान केंद्र में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतीय ज्ञान प्रणाली में पाली भाषा एवं साहित्य का योगदान” का बुधवार को शुभारंभ हुआ। कला संकाय के पाली एवं बौद्ध अध्ययन विभाग की ओर से आयोजित यह सम्मेलन 19 फरवरी तक चलेगा। इसमें भारत सहित छह देशों के विद्वान, भिक्षु और शोधार्थी भाग ले रहे हैं।
सम्मेलन संयोजक डॉ. बुद्ध घोष ने बताया कि आयोजन के लिए कुल 141 सार (एब्स्ट्रैक्ट) प्राप्त हुए थे, जिनमें से 81 शोध-पत्र प्रस्तुति के लिए चयनित किए गए हैं। कला संकाय की अधिष्ठाता प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने सम्मेलन को “बौद्धिक प्रतिभाओं की आकाशगंगा” बताते हुए कहा कि इससे महत्वपूर्ण शैक्षणिक निष्कर्ष सामने आएंगे और भारतीय भाषाओं व ज्ञान परंपराओं के अध्ययन को नई दिशा मिलेगी।

पाली: भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण स्रोत
मुख्य वक्ता प्रो. के.टी.एस. सराव (पूर्व प्रोफेसर, University of Delhi; वर्तमान में Nalanda University) ने कहा कि पाली को भारत सरकार द्वारा शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाना ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने बताया कि पाली किसी एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में नहीं, बल्कि मध्यदेश में प्रचलित विभिन्न प्राकृत बोलियों के मानकीकरण का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि Gautama Buddha ने अपने उपदेश स्थानीय बोलियों में दिए थे, जिन्हें बाद में बौद्ध संगितियों—प्रथम, द्वितीय और तृतीय—के दौरान व्यवस्थित किया गया। Ashoka के काल में इस प्रक्रिया को और बल मिला तथा पाटलिपुत्र क्षेत्र की भाषा को प्रतिष्ठा मिली। अशोक द्वारा अपने प्रतिनिधियों को Sri Lanka भेजे जाने के बाद पाली परंपरा वहां स्थापित हुई और आगे चलकर थेरवाद बौद्ध धर्म की प्रमुख भाषा बनी।

क्या है पाली भाषा?
विशेषज्ञों के अनुसार “पाली भाषा” शब्द अपेक्षाकृत आधुनिक है और इसकी सटीक उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद है। छठी-सातवीं शताब्दी तक पाली नाम की कोई विशिष्ट भाषा नहीं मानी जाती थी। इसके सबसे पुराने संदर्भ बौद्ध विद्वान बुद्धघोष की टीकाओं में मिलते हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण में पाली साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि इसमें अतीत से जुड़ी बहुमूल्य जानकारी निहित है। आज भी पाली का अध्ययन Myanmar, Thailand, Japan, China और अन्य बौद्ध देशों में जारी है।
शास्त्रीय भाषा का दर्जा क्यों महत्वपूर्ण
प्रो. सराव ने कहा कि पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलने से इसके पुनरुद्धार की राह खुली है। इससे सरकार शिक्षण संस्थानों में पाली अध्ययन को बढ़ावा देने, इसकी साहित्यिक विरासत के संरक्षण और ऐतिहासिक शोध को प्रोत्साहित करने के लिए नई योजनाएं लागू कर सकेगी।
क्या होती है शास्त्रीय भाषा?
शास्त्रीय भाषाएं वे प्राचीन भाषाएं होती हैं जिनकी स्वतंत्र परंपरा और समृद्ध साहित्यिक इतिहास होता है। मंत्रिमंडल की नवीनतम मंजूरी के बाद भारत में मान्यता प्राप्त शास्त्रीय भाषाओं की संख्या अब 11 हो गई है।
इससे पहले तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया को यह दर्जा प्राप्त था। सम्मेलन के आयोजकों का विश्वास है कि यह आयोजन पाली भाषा के संरक्षण और भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
