चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन: काशी में मां कूष्मांडा के दर्शन को उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, दुर्गाकुंड मंदिर में भोर से पूजन

चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन: काशी में मां कूष्मांडा के दर्शन को उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, दुर्गाकुंड मंदिर में भोर से पूजन

वाराणसी (रणभेरी): चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन भक्त देवी के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा कर रहे हैं। काशी के दुर्गाकुंड क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध दुर्गा कुंड मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। भक्त माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि और मंगल की कामना कर रहे हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब देवी के कूष्मांडा स्वरूप ने ही अपनी दिव्य शक्ति से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदिशक्ति माना जाता है।

प्रकृति और पर्यावरण की अधिष्ठात्रीमां

कूष्मांडा को प्रकृति और पर्यावरण की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है। मान्यता है कि उनकी आराधना के बिना साधना, जप और ध्यान पूर्ण नहीं माना जाता। मंदिर के महंत दीपू दुबे के अनुसार, इस दिन श्रद्धालु माता को गुड़हल का फूल, नारियल और चुनरी अर्पित करते हैं। भक्त “या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि रूपेण संस्थिता…” मंत्र का जाप कर माता की पूजा करते हैं।

यह भी विश्वास है कि मां कूष्मांडा के दर्शन और पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा जीवन में संतोष और समृद्धि आती है। नवरात्रि के चौथे दिन अन्न और सब्जियों का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन: काशी में मां कूष्मांडा के दर्शन को उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, दुर्गाकुंड मंदिर में भोर से पूजन

मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यता

धार्मिक कथाओं के अनुसार, देवी ने शाकंभरी रूप धारण कर पृथ्वी को शाक-सब्जियों से समृद्ध किया था। वहीं शताक्षी रूप में उन्होंने दैत्यों का संहार किया। यह भी मान्यता है कि शुंभ और निशुंभ का वध करने के बाद देवी दुर्गा ने इसी स्थान पर विश्राम किया था।

दुर्गाकुंड स्थित इस प्राचीन मंदिर की एक खास परंपरा यह भी है कि यहां प्रतिमा के स्थान पर देवी के मुखौटे और चरण पादुकाओं की पूजा की जाती है। मंदिर का स्थापत्य बीसा यंत्र पर आधारित बताया जाता है, जो बीस कोणों वाली यांत्रिक संरचना का प्रतीक है और उसी आधार पर मंदिर की नींव रखी गई है।

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