प्रशासन के लाख सख्ती के बाद भी बनारस में फैला है जानलेवा जाल
इंसानों के साथ पक्षियों और मशीनों के लिए भी खतरा, कई मौतों का जिम्मेदार
प्रतिबंध के बावजूद कमजोर कार्रवाई, पुलिस की तलाश सिर्फ औपचारिक ?
वाराणसी (रणभेरी): काशी की फिज़ाओं में इन दिनों पतंगों की ऊंची उड़ान जितनी रोमांचक दिखती है, उतनी ही खतरनाक साबित हो रही है। वजह है…प्रतिबंधित चाइनीज मांझा, जो एक बार फिर आसमान में मौत बनकर उड़ रहा है। यह वही मांझा है जिसने बीते वर्षों में बनारस समेत प्रदेश के कई शहरों में लोगों की जान ली, गले रेत दिए और मासूम पक्षियों को तड़पा-तड़पाकर मार डाला। इसके बावजूद शहर में इसकी बिक्री बेखौफ जारी है।

सूत्रों के मुताबिक, वाराणसी के बाजारों में इस वक्त 10 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का चाइनीज मांझा गोदामों में डंप है। दालमंडी के कुंजीगढ़ टोला, लोहता, शिवपुर, चेतगंज, हरतीरथ, आदमपुर समेत कई इलाकों में यह मांझा थोक से लेकर फुटकर तक आसानी से उपलब्ध है। बाजार में एक किलो चाइनीज मांझा 800 से 900 रुपये तक बेचा जा रहा है। पतंगबाजी के मौसम के नाम पर खुलेआम हो रही इस बिक्री ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भारत सरकार द्वारा चाइनीज मांझे पर पूर्ण प्रतिबंध के बाद भी जिला प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई असरदार साबित नहीं हो पा रही है। बीते दिनों में छापेमारी के दौरान कई क्विंटल चाइनीज मांझा बरामद जरूर हुआ, लेकिन सख्त कानूनी कार्रवाई के अभाव में तस्कर और दुकानदार फिर सक्रिय हो गए। हालात यह हैं कि बनारस की गलियों से लेकर चौक-चौराहों तक यह जानलेवा डोर धड़ल्ले से बिक रही है।
आखिर क्यों है चाइनीज मांझा इतना खतरनाक
भारत में पारंपरिक मांझा सूती या साधारण धागे से तैयार होता है, जबकि चीन में बनने वाला मांझा नायलॉन से बनाया जाता है। इसे और धारदार बनाने के लिए इसमें कांच का बुरादा और लोहे का चूर्ण मिलाया जाता है। नायलॉन की मजबूती के कारण यह मांझा पेच लड़ने पर टूटता नहीं, बल्कि सामने वाले को काट देता है। यही वजह है कि यह इंसानों के गले, हाथ और चेहरे के लिए जानलेवा साबित होता है। सिर्फ इंसान ही नहीं, चाइनीज मांझा पक्षियों के लिए भी काल बन चुका है। उड़ते पक्षियों की गर्दन और पंख इसमें फंसकर कट जाते हैं। कई बार बिजली के तार, बाइक सवार और यहां तक कि मशीनें भी इसकी चपेट में आकर दुर्घटना का शिकार हो चुकी हैं।

सवालों के घेरे में प्रशासन
सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतिबंध के बावजूद इतना बड़ा स्टॉक शहर में कैसे पहुंच रहा है? क्या पुलिस और प्रशासन की निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं? जब तक चाइनीज मांझा बेचने और इस्तेमाल करने वालों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर उड़ती पतंग के साथ मौत का खतरा भी आसमान में मंडराता रहेगा। जनहित की मांग है कि प्रशासन सिर्फ छापेमारी तक सीमित न रहे, बल्कि सप्लाई चेन तोड़कर दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करे, वरना आने वाले दिनों में काशी की फिज़ाओं में यह जानलेवा डोर और भी कई जिंदगियां निगल सकती है।
