महंगाई और चाइनीज मांझे से प्रभावित कारोबार, कोलकाता से आए कारीगरों ने सरकार से लगाई गुहार
वाराणसी (रणभेरी) : मकर संक्रांति पर्व नजदीक आते ही काशी में पतंगबाजी का उत्साह चरम पर पहुंचने लगा है। पर्व में अब कुछ ही दिन शेष हैं और शहर के विभिन्न इलाकों में पतंग बनाने और बेचने का काम तेज हो गया है। बाजारों में रंग-बिरंगी पतंगों से रौनक तो दिख रही है, लेकिन इसके पीछे कारीगरों की चिंता भी छिपी हुई है। हर साल की तरह इस बार भी देश के अलग-अलग हिस्सों से कारीगर वाराणसी पहुंचे हैं।

इन्हीं में कोलकाता से आए कारीगर नौशाद अली भी शामिल हैं, जो बीते कई वर्षों से पतंग निर्माण के काम से जुड़े हुए हैं। नौशाद अली बताते हैं कि वह मूल रूप से कोलकाता के निवासी हैं और पूरे साल वहीं पतंग बनाने का काम करते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के दौरान बेहतर आमदनी की उम्मीद में वाराणसी आ जाते हैं। उनका कहना है कि काशी में पतंग का बाजार कोलकाता की तुलना में बेहतर रहता है, इसलिए यहां आकर मेहनत करना फायदेमंद होता है।
उन्होंने बताया कि पतंग बनाने में कागज, गोंद, कमानी और चादर का इस्तेमाल किया जाता है। कागज दिल्ली से मंगाया जाता है, कमानी कानपुर से आती है, जबकि अन्य सामग्री तुलसीपुर और कभी-कभी कोलकाता से भी आती है। एक अनुभवी कारीगर दिनभर में अपनी दक्षता के अनुसार 800 से 1200 तक पतंग बना लेता है। छोटी से लेकर बड़ी साइज की पतंगें बाजार में 1 रुपये से 10 रुपये तक बिकती हैं।

हालांकि बढ़ती महंगाई ने कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। नौशाद का कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, वहीं ग्राहक भी पहले की तुलना में कम खरीदारी कर रहे हैं। इससे कारीगरों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो गया है। नौशाद अली ने सरकार से मांग की है कि पतंग कारीगरों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। उन्होंने खतरनाक चाइनीज और लाइनिंग वाले मांझे पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका कहना है कि चाइनीज मांझा जानलेवा साबित हो रहा है, जबकि स्थानीय कारीगर साधारण धागे का ही उपयोग करते हैं। कारीगरों का कहना है कि यदि समय रहते उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तो उनके परिवारों के सामने जीवन-यापन का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
