मंडुवाडीह में सजी रूहानी महफिल, चादरपोशी, दुआ और कव्वाली से गूंजा दरगाह परिसर
मेले में झूले, दुकानों और पकवानों की बहार, बनारस की गंगा-जमुनी तहजीब की झलक
वाराणसी (रणभेरी)। काशी की साझा संस्कृति और रूहानी परंपरा का जीवंत उदाहरण मंडुवाडीह में देखने को मिल रहा है, जहां सूफी संत हजरत तैयब शाह बनारसी रहमतुल्लाह अलैह के सालाना उर्स के मौके पर अकीदतमंदों का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। ‘छोटी ईद’ के इस खास अवसर पर दरगाह शरीफ पूरी तरह रोशनी और आस्था के रंग में सराबोर है। सुबह से ही दरगाह पर जायरीनों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई, जो दोपहर तक हजारों की संख्या में पहुंच गई।
अकीदतमंद मजार पर मखमली चादर और गुलाब के फूल पेश कर अपनी मन्नतें मांग रहे हैं। दरगाह की चौखट पर माथा टेकते ही लोगों के चेहरों पर सुकून और श्रद्धा साफ झलक रही है। आमीन की गूंज और दुआओं का सिलसिला पूरे वातावरण को रूहानियत से भर रहा है।
दरगाह के बाहर सजा मेला इस आयोजन को और भी खास बना रहा है। सड़कों के किनारे लगी अस्थायी दुकानों पर बनारसी हलवा-पराठा, खिलौने और श्रृंगार सामग्री की भरमार है। बड़े झूले और चरखियां बच्चों व युवाओं के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। यह मेला न केवल धार्मिक आयोजन, बल्कि बनारसी जीवन की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया है, जहां हर समुदाय के लोग उत्साह के साथ शामिल होते हैं।
शाम ढलने के साथ रौनक और बढ़ने की उम्मीद है। दरगाह परिसर में कव्वाली के लिए विशेष मंच तैयार किए गए हैं, जहां नामचीन कव्वाल सूफियाना कलाम पेश करेंगे। भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात के पुख्ता इंतजाम किए हैं। मंडुवाडीह आज न सिर्फ रोशनी से जगमगा रहा है, बल्कि यह मोहब्बत, भाईचारे और आस्था का केंद्र बनकर काशी की गंगा-जमुनी तहजीब को एक बार फिर जीवंत कर रहा है।
